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मानव-बोध

Hari Shankar

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            मानव बोध से परिपूर्ण पर बोध से ही दूर क्यों है
        
                                                    
                            
भ्रम में भटकता रहा हर बात पर मजबूर क्यों है

सोचना विचारना विमर्श की शक्ति मिली
उस अन्तर्मन को छोड़कर हो रहा मगरूर क्यों है

मार्ग स्वयं में निहित नजर मगर बाहर को है
जो नहीं अपना कभी झूठा ही मशहूर क्यों है

अस्तित्व अनस्तित्व ने ना जाने कब से घेरा हुआ
अन्जान खुद की शक्ति से हो रहा दूर क्यों है


हरिशंकर 'हरि'
3 वर्ष पहले
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