मानव बोध से परिपूर्ण पर बोध से ही दूर क्यों है
भ्रम में भटकता रहा हर बात पर मजबूर क्यों है
सोचना विचारना विमर्श की शक्ति मिली
उस अन्तर्मन को छोड़कर हो रहा मगरूर क्यों है
मार्ग स्वयं में निहित नजर मगर बाहर को है
जो नहीं अपना कभी झूठा ही मशहूर क्यों है
अस्तित्व अनस्तित्व ने ना जाने कब से घेरा हुआ
अन्जान खुद की शक्ति से हो रहा दूर क्यों है
हरिशंकर 'हरि'