विज्ञापन

प्यारा बचपन

Johnny Ahmed

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            वक़्त की उँगली पकड़े हुए जब
        
                                                    
                            
आधी ज़ीस्त गुज़र गई,
आधे साथी पीछे छूटें
और आधों की ख़बर नहीं।

यक-लख़्त किसी इक शाम को
मैं ठहरा और फिर खो गया,
यादों के सौ बादल छाएं
मैं फिर से बच्चा हो गया।

बे-परवाह अपना बचपन था
बे-फ़िक्री उसकी निशानी,
हर रोज़ इक नया किस्सा था
हर दिन इक नई कहानी।

जाने किस मनहूस घड़ी में
नज़र लग गई दुश्मन की,
हुए जवाँ और मौत हो गई
अपने प्यारे बचपन की।

-जॉनी अहमद 'क़ैस'
3 वर्ष पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all