रिश्तों के इस चक्रव्यूह में,
अभिमन्यु ही तो सारे हैं,
थोड़ी थोड़ी जीत लिए ,
ज़्यादा ज़्यादा ही हारे हैं l
जोड़ घटाना गुणा भाग,
बस चलते ही रहता है,
कहीं किरकिरी से चुभते,
कहीं आंख के तारे हैं ll