मुस्कान बुझ गई चेहरे की
ना रहा शिकन का दाग
शिथिल हुई आँखों की चमक
ना दर्द का ही एहसास
एक भीड़ जमा थी इर्द-गिर्द
खुद रहा न खुद के पास
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