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कमी

Kriti Bhatia

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            पाकर भी सब कुछ जिंदगी में कमी सी क्यों हैं
        
                                                    
                            
जो न सोचा था उसे पाकर बेबसी सी क्यों है।।
जिंदगी ने सब कुछ दिया हमें,
फिर भी दिल के सकून की कमी सी क्यों हैं।।
न चाहकर भी कुछ सपने हो गए पूरे,
फिर भी जिंदगी में इक सपने की कमी सी क्यों हैं
यूं तो कहने को सभी कहते हैं मैं खुशकिस्मत हूं।।
फिर भी मन मे खुशी की कमी सी क्यों हैं
मैं शायद सभी से प्यार करती हूं लेकिन,
ये दुनिया मुझसे खफा सी क्यों हैं।।
मेरी जिंदगी में विश्वास की कमी सी क्यों हैं
अपने पूछते हैं आंखों में नमी सी क्यों हैं।।
पाकर भी सब कुछ जिंदगी में कमी सी क्यों हैं।।

- कृति भाटिया

- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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7 वर्ष पहले
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