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तस्वीर

lokesh tripathi

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            चेहरे तो सबके एक जैसे हैं
        
                                                    
                            
फिर हर तस्वीर अलग कैसे है
कोई जुगनू सा टिमटिमाता है
कुछ तो बस स्याह रात जैसे हैं,

माँ की आंखों का मैं भी तारा हूँ
घर मे सबका मैं भी दुलारा हूँ
जमीं पर जो कभी गिरे ही नहीं
उनके लिए, हम धूल जैसे हैं

मैंने जिद छोड़ दी है अब माँ से
कुछ मांगता भी नहीं अब माँ से
मेरी बीमारी में वो जा न सकी
हाथ में कुछ रोज के ही पैसे हैं।

वो सब चीजें मुझे भी चहिए थीं
जो घर मे उनके यूँ ही बिखरी हैं
माँ मुझको बहुत समझाती है,
सब खिलौने बस एक जैसे हैं।

- लोकेश त्रिपाठी

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6 वर्ष पहले
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