चेहरे तो सबके एक जैसे हैं
फिर हर तस्वीर अलग कैसे है
कोई जुगनू सा टिमटिमाता है
कुछ तो बस स्याह रात जैसे हैं,
माँ की आंखों का मैं भी तारा हूँ
घर मे सबका मैं भी दुलारा हूँ
जमीं पर जो कभी गिरे ही नहीं
उनके लिए, हम धूल जैसे हैं
मैंने जिद छोड़ दी है अब माँ से
कुछ मांगता भी नहीं अब माँ से
मेरी बीमारी में वो जा न सकी
हाथ में कुछ रोज के ही पैसे हैं।
वो सब चीजें मुझे भी चहिए थीं
जो घर मे उनके यूँ ही बिखरी हैं
माँ मुझको बहुत समझाती है,
सब खिलौने बस एक जैसे हैं।
- लोकेश त्रिपाठी
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