विज्ञापन

बारिश

Manoj Yadav

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            बारिशों ने आज फिर
        
                                                    
                            
दिल के बन्द कोने में पड़ी
यादों को हरा कर दिया
घर के छप्पर से
टप टप करती बूंदें
हर बूंद की तबाही को भगौने में
समेटने की कोशिश करती मां
आंगन में रखे चूल्हे
को बचाने की कवायद
करती बड़ी बहन
भूख से बिलखता छोटा भाई
हाथ में बड़ा सा सरिया लिए
नाली के पानी को बाहर
धकेलते परेशान पिताजी
और इन सब से बेखबर
निश्चिंत घर की छत पर
छप छप कर खेलता
बारिशों का मजा लेता मैं।
आज बारिशें तो हैं
पर न वो छत है
न वो कोलाहल करता
घर का आंगन
न वो एकता के सूत्र में बंधे
छोटे बड़े भाई बहन
न भविष्य के प्रति बेचैन पिता
न आंचल से पानी पोंछती मां
हूं तो बस अकेला
जिम्मेदारियों का बोझ समेटे
बारिश की पुरानी यादों में
खुद को ढूंढने की कोशिश करता मैं।

-मनोज यादव

-हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
7 वर्ष पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all