बारिशों ने आज फिर
दिल के बन्द कोने में पड़ी
यादों को हरा कर दिया
घर के छप्पर से
टप टप करती बूंदें
हर बूंद की तबाही को भगौने में
समेटने की कोशिश करती मां
आंगन में रखे चूल्हे
को बचाने की कवायद
करती बड़ी बहन
भूख से बिलखता छोटा भाई
हाथ में बड़ा सा सरिया लिए
नाली के पानी को बाहर
धकेलते परेशान पिताजी
और इन सब से बेखबर
निश्चिंत घर की छत पर
छप छप कर खेलता
बारिशों का मजा लेता मैं।
आज बारिशें तो हैं
पर न वो छत है
न वो कोलाहल करता
घर का आंगन
न वो एकता के सूत्र में बंधे
छोटे बड़े भाई बहन
न भविष्य के प्रति बेचैन पिता
न आंचल से पानी पोंछती मां
हूं तो बस अकेला
जिम्मेदारियों का बोझ समेटे
बारिश की पुरानी यादों में
खुद को ढूंढने की कोशिश करता मैं।
-मनोज यादव
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