चल आज इश्क़ का
क़त्ल-ए-आम करते हैं,
जो फिर एक नई सुबह है
उसे शाम करते हैं।
तुम्हें पढ़े तो पढ़े कौन,
ऐ- सरफरोश ?
तेरी बन्दगी में ही,
सब अपनी जान देते हैं ।
ये मुस्कराने का गुनाह,
करते रहें हैं 'अक्सर' ।
क्यों न अब
शिकायत को 'अंजाम देते हैं ? -
चल हाथ पकड़कर चल
दो कदम साथ ही चल ।
एक ही दर पर
सभी रिश्तों को सलाम करते हैं।
ये फलसफा है.
अब बसर कर खुद को
हर सुबह को मुस्कुराकर
नयी जिंदगी का आगाज़ करते हैं ।
-मृत्युञ्जय कुमार पाण्डेय
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