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रक्त रंजित वक्त का दस्तूर है

Mukesh Dwivedi

Mere Alfaz
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                            रक्त रंजित वक्त का दस्तूर है।
        
                                                    
                            
इसलिये कविता मेरी मजबूर है।।
क्या करेंगे उपनिषद के मंत्र अब।
सभ्यता ही जबकि उनसे दूर है।।
बन्दरों के हांथ रखबाली चमन की।
कोयलों का कंठ चकनाचूर है।।
दिग्भ्रमित अब "सरल" पथ का पुजारी।
रामनामी ओढ़नी मे छिप रहा मगरूर है।।
वो रहा कोई फसल और काटता कोई।
खा रहा कोई उचक्का वक़्त कितना क्रूर है।।

कवि मुकेश द्विवेदी एडवोकेट
हरपालपुर हरदोई (उ. प्र)

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8 वर्ष पहले
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