लोग हैं कुछ इस तरह बोझिल न पूछिये
कब कौन बनेगा यह जाहिल न पूछिये ।।
देने लगे हैं लोग अब अपनों की सुपारी
है काैन यहाँ किसका कातिल न पूछिये ।।
हिम्मत नहीं तो सच में किनारे डुबो देंगे
तूफान से लड़ना है तो साहिल न पूछिये ।।
जो खटक रही थी लुटेरों की नजर में
उस कटी पतंग की मंजिल न पूछिये ।।
कुछ भेड़ियो के डर से छुप जाते है अक्सर ।
मुझ जैसे यहा बहुत है बुजदिल न पूछिए ।।
- पिंटू इलाहाबादी
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