यह दिल है मेरा
झूठ फरेब की कलाबाजियां,
करते नित क्रीड़ा स्थल में।
आंखमिचौली खेला करते,
सत्य छुपाकर अंतः तल में।
खेलने का सामान नहीं,
क्यों इससे खेला करते हो?
हर पल देकर दर्द इसे,
बस झूठी आहें भरते हो।
कोई खेल नहीं, मैदान नहीं,
मत खेलो--यह दिल है मेरा।
लिए सहारे प्रेमालिंगन के,
पनपती जो कोमल वल्लरियाँ।
मधुमय यादें संचित करके,
इसमें फुटती है जो कलियां।
जब पाते स्पर्श तुम्हारा,
खिल उठते हैं फूलों सा।
मगर जो टूटे वादे-इरादे,
चुभने लगते है शूलों सा।
ईरादा नहीं, कोई वादा नहीं,
मत तोड़ो--यह दिल है मेरा।
अथाह समंदर भावों का,
उठती नित् इसमें भी लहर।
जिन भावों से झंकृत होते,
इसमें उठते वैसे ही स्वर।
सुर सरिता सी बहने लगती,
जब कोई अन्तर आन बसे।
टूट जाता अनजाने में ही,
छेड़े जो इसके तार कसे।
कोई साज नहीं, आवाज नहीं,
मत छेड़ो--यह दिल है मेरा।
--प्रमोद कुमार,
मेन रोड, टंडवा (वनांचल ग्रामीण बैंक के निकट)
पत्रालय एवं जिला - गढ़वा (झारखण्ड) ८२२११४
सम्प्रति - प्रधान लिपिक, समाहरणालय, गढ़वा।