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चिराग़

Prince Singh

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            यार मेरा मर गया, जिया कहीं भी नहीं
        
                                                    
                            
सवाल ही सवाल थे, जवाब एक भी नहीं

सोचा कहीं निकल चलु, सुकून की तलाश में
भटके शहर-ए-दिल में, सुकून कहीं भी नहीं

है दिल एक परिंदा, जो ज़ेहनी बीमार था
यानी जब रिहा हुआ, उडा कहीं भी नहीं

कर लिया था फैसला, छोड दूंगा उसका शहर
निकाले पैर घर से, गया कहीं भी नहीं

जमाल-ए-यार हुस्न का, असर कुछ यु हुआ
इश्क कब हम हुआ, याद ये भी नहीं

ये क्या मुझे हुआ, बाद तेरे जाने जाह
हिज्र अब आम है, खास कुछ भी नहीं

कमाल का विसाल था, कमाल का फ़िराक़ था
खतम हुई यह दास्ताँ, फ़रियाद कुछ भी नहीं
3 वर्ष पहले
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