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साहित्य समाज का दर्पण

Punit Tiwari

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            साहित्य बना दर्पण दीपक कहलाता है
        
                                                    
                            
घने कोहरे में भी हमे राह दिखता है
मुर्दे में भी चेतना जहाँ साहित्य गढ़ता है
समाज बना आत्मा तन साहित्य गढ़ता है

बनाता आसन ध्येय आदर्श साहित्य बुनता है
भावों की बहती गङ्गा छन्द साहित्य गढ़ता हैं
बनता कभी रूपक साहित्य का आभूषण
करता कभी अलंकरण भ्रान्ति का अन्वेषण

धरकर रूप लावण्य जब साहित्य आता है
श्रृंगार रश्मियों से पुनीत मन को लुभाता है
बनता मर्म जब भी भावों की अभिव्यक्ति
उपदेश बन गीता भाव हिय में समाती है

शिथिल होती भुजाएं चख नम हो जाते हैं
ले कर स्वरूप गीता का गिरधारी आते हैं
साहित्य बनता दर्पण प्रकाश का आलम्बन
धरकर स्वरूप मर्यादा का त्रिपुरारी आते हैं

-  पुनीत बाघा जतिन आजाद

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5 वर्ष पहले
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