जब तुझे पहली बार देखा
देखते ही रह गया
इक फूल सा मन में खिला
जिससे हर अंग महक उठा
वह एक बार का देखना
देखने का सिलसिला हो चला
तुम मोनालिसा के तस्वीर जैसी
दिल में उतर चुकी थी
दिनोरात दिल में रहती
रातों की नीद उड़ चुकी थी
ना आंखों में नींद था
ना दिल में करार
ना जाने कैसा रोग था
हे मेरे सरकार
तुम्हारी एक झलक पाने को
दिल बेकरार रहता
जो तुझे देखता तो
मुझे करार मिलता
ना जाने ये कैसा आकर्षण था
जिसके बिना विकर्षण ही विकर्षण था।
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