मैं कुछ कहना चाहता हूँ उससे
पर कह नहीं पाता हूँ
जाता हूँ उसके पीछे
पर बिना उसके रह नहीं पाता हूँ
एक दिन वो मुझसे यूँ मूड़ बोली
करते क्यों हो तुम ऐसा
मिलता क्या है करके ऐसा
हर बार मेरे पीछे आते
देखते ही कहीं छुप जाते
अब मैं कैसे चुप रह जाता
क्या ज़वाब दूँ ये सोचता रह जाता
तब मैंने अपनी हिम्मत जुटायी
उसके सामने नज़रें उठाई
और बोला
ये जादू तुम्हारी जुल्फों का
जो मुझे खींच लाया है
तुम्हें देख कर लगता कि
कोई चाँद जमीं पर आया है
जैसे तुम कोई गुलाब की कली हो
मेरी पुरानी कोई अली हो
जैसे हरियाली देख कोई
सावन का झूला झूल गया
तुम्हें देख मैं देखो अपना
रास्ता जैसे भूल गया.....
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