जो भी चीज़ देखता हूं
वो तुम तक...
खींच ले जाती है
जो भी लोग दिखते हैं
वो भी तुमसे,
जुड़े हुए हैं
खोया-खोया सा
सड़कों पे,
पाया जाता हूं
उसी मोड़ पर
जहां तुम मुझे,
अनदेखा करती हुयी...
उनके साथ,
आगे बढ़ गयीं थी
तुम्हारा यूं
खिलखिलाते हुये
चलते जाना...
मैंने मरा है उस समय
हर क्षण, उसके बाद से
प्यार ना मिल पाना
बड़ी गंदी चीज़ है!
अब मैं भी मानने लगा हूं
कि वो समझदार होते हैं
जो नहीं बोलते
इंकार के बाद की तड़पन
झेल नहीं पाओगे
उनको खुदसे, दूर करना पड़ा
उनकी शिकायतें करने...
मैं अब उनका,
सहयोग नहीं कर पाता
उनसे, बात करने के दौरान
कभी कभी लगता है,
ऐसे ही बकता रहता हूं
बिना कुछ जाने
वो 'डेस्पेरेट' शब्द
मेरे लिए ही कहते हैं?
अब ऐसा लगता है
मैंने कभी,
प्यार ही नहीं किया...
हमेशा बस,
सुन्दर लड़कियों के पीछे
भागा हूं
अपना आत्मविश्वास
कैसे जगाऊं मैं?
गानों को सुनके
तुम्हारे लिए कवितायें लिखना
कब तक जारी रहेगा?
- राहुल, सागर