तेरी नज़रों को देखा, नशा मुझे चढ़ गया।
नज़रों का तीर आया, दिल पे मेरे लग गया।
मुझपे इल्ज़ाम, सब शराब का लगाते हैं।
उन्हें क्या पता, वो काम नज़रों से कर गया।
उनकी नज़रों के आगे, मैखाने हैं कुछ भी नहीं।
कितने आये कितने गये, जाम जो हैं कुछ भी नहीं।
नज़रों की चर्चा हमने, सुन ली तेरे कूचे में।
शिकार तूने कितने किये, पता हमें कुछ भी नहीं।
झुकाके अपनी नज़रें तूने, प्यार का पैग़ाम दिया।
उठायीं जब नज़रें तूने, क़त्ल-ए-आम कर दिया।
चाल तेरी थी या तेरी नज़रों की थी ये।
सबने क़त्ल-ए-आम को, कज़ा का नाम दे दिया।
पता चला नज़रें तेरी, जादू कैसा करती हैं।
बिना बोले बिना छूये, वार ऐसा करती हैं।
नज़रें गर उठ गयीं तो, सम्भलते हुये चलना तुम।
क्योंकि सीधा दिल में ये, अपना घर करती हैं।
नज़रों से नज़रें मिलाके, लूटना अच्छा नहीं।
खुशियों के साथ गम देके, लूटना अच्छा नहीं।
लूटने का मन हुआ तो, तुमने नज़रें तिरछी की।
देखो ऐसे दिल में समाके, लूटना अच्छा नहीं।
लूट उसकी मेरे दिल में, खलबली मचाती है।
नज़रें चुराकर देखे वो, मेरे सामने से जाती है।
गर ये मुहब्बत नहीं, क्या है ये बताओ तुम।
दवा क्या है इसकी और क्या ये कहलाती है।
किया इजहार, इनकार मैंने पा लिया।
वो बोले मजाक था ये, तुमने क्या समझ लिया।
मेरा दिल तबाह हुआ, इसका गम नहीं मुझे।
मेरी जगह होता जो दिल, उसको तो बचा ही लिया।
मौलिक/स्वरचित (08.02.2013)
राज शेखर भट्ट
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