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प्रतिकार

Ranjeet Kumar

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            ये कब तक चलेगा, यूँ होता रहेगा,
        
                                                    
                            
रक्षक धरा का, यूँ खोता रहेगा,
आहूति प्राणों की जाती रहेगी,
लाशें जवानों की आती रहेगी,
कब तक यूँ अंतिम संस्कार करोगे,
अब तो कहो कि, प्रतिकार करोगे।

अब धर्मयुद्ध की रीति नहीं है,
भीष्म द्रोण की नीति नहीं है,
हो मूक सहोगे बर्बरता को,
तो प्राप्त करोगे कायरता को,
मस्तक उतरे धड़ से रिपु का,
ऐसा प्रचंड प्रहार करोगे,
अब तो कहो कि प्रतिकार करोगे।

वीर हमारे अद्भुत हैं,
वो रण में शौर्य दिखाते हैँ,
पर यह तो कोई बात नहीं,
बिन युद्ध वीरगति पाते हैं,
अब काल स्वयं ही कहता है,
शत्रु का दुर्ग हिला डालो,
जो राख चिता से निकली है,
उसमे ही उसे मिला डालो,
प्रण लो तुम हे भरतवंशियों,
शठे शाठ्यं व्यवहार करोगे,
अब तो कहो कि प्रतिकार करोगे।

रक्त बहा है पुत्रों का,
सीमा के रक्षासूत्रों का,
उपवन में घोर उदासी है,
चितायुक्त क्यों काशी है,
चीख सुनों उन माँओं की,
विलख रही अबलाओं की,
ये संतानें क्यूँ मूक खड़ी हैं,
न समझोगे तो चूक बड़ी है,
तिनका-तिनका कुछ बिखरा सा है,
अश्कों से धुलकर निखरा सा है,
उद्भित हर डब-डब आँखों के,
वो स्वप्न भला साकार करोगे,
अब तो कहो कि प्रतिकार करोगे।

-रंजीत कुमार चौरसिया अनुभव 


- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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7 वर्ष पहले
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