रचनाएँ वही सफल होती हैं
जो जीवन को जी जाती हैं
ईर्ष्या, द्वेष, घृणा, तिरस्कार
सब एक घूँट में पी जाती हैं
समाज में उभरी दरारों को
सबल शब्दों से सी जाती हैं
आगे भी नई पीढ़ी के द्वारा
नाम सम्मान से ली जाती हैं
सभ्यता,संस्कृति बचने हेतु
ऐसी ही रचनाएँ की जाती हैं
- सलिल सरोज
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