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सूरज बड़ी इमारतों में अटक गया है कहीं

Salil Saroj

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            सबके घरों में रोशनी एक सी आती नहीं अब
        
                                                    
                            
सूरज बड़ी इमारतों में अटक गया है कहीं

पेड़, पक्षी, नदी, नाले हैं प्यास से आकुल-व्याकुल
बादल इन्हीं बियाबां में भटक गया है कहीं

जगाते हैं जुगनुओं से ही सारी की सारी रात
चाँद बल्ब की तरह चौराहे पे लटक गया है कहीं

साल के चार मौसम दिखते ही नहीं यहाँ
घूस समझ कोई मंत्री सब गटक गया है कहीं

बाग-बगीचे अपनी तबियत से खिला करते नहीं
अफसर की निगाह में माली खटक गया है कहीं

सलिल सरोज

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6 वर्ष पहले
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