सबके घरों में रोशनी एक सी आती नहीं अब
सूरज बड़ी इमारतों में अटक गया है कहीं
पेड़, पक्षी, नदी, नाले हैं प्यास से आकुल-व्याकुल
बादल इन्हीं बियाबां में भटक गया है कहीं
जगाते हैं जुगनुओं से ही सारी की सारी रात
चाँद बल्ब की तरह चौराहे पे लटक गया है कहीं
साल के चार मौसम दिखते ही नहीं यहाँ
घूस समझ कोई मंत्री सब गटक गया है कहीं
बाग-बगीचे अपनी तबियत से खिला करते नहीं
अफसर की निगाह में माली खटक गया है कहीं
सलिल सरोज
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