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कितनी हसीं हैं उसकी आँखें

Salil Saroj

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            कितनी हसीं हैं
        
                                                    
                            
उसकी आँखें
जो
मेरी खराबियाँ
नहीं देखती
और
न ही
आँखें तरेरती हैं
और
गुस्से में
समन्दर नहीं बन जाती हैं
जब भी मैं
गलत कर जाता हूँ
जाने या अनजाने
और
ना ही
जलन से
लाल हो जाती हैं
जब
यूँ ही
किसी और को
मैं देख लेता हूँ
वो आँखें
मेरे सपनों
को अपनी आँखों में
भर कर
जी उठती हैं
कितनी हसीं हैं
उसकी आँखें।

सलिल सरोज

- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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7 वर्ष पहले
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