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मंथन

sarika saxena

Mere Alfaz
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                            दिल को कर उदास, आंसू ना बहा बारंबार
        
                                                    
                            
न जाने किस तपते मन की तू बुझा दे तू प्यास

असंख्य देवगण खड़े उस नील आकाश के पार
समझाते हमे कोई भी नहीं पूर्ण न कोई बेकार

ठोकर से टूटता है शीशा चरित्र में नहीं पड़ती दरार
क्षमा से बड़ा कोई दान नहीं यह सत्य अभिराम

ठोकर से सीखो समझो ना करो कभी तकरार
खुद की नजर में गिरे तो ईश्वर भी नहीं उठाएगा

ना जाने कब कौन कहां से दिखा हमे सही राह
बनना है सच्चा इंसान,करो हर मित्र को स्वीकार
न जाने कौन आये द्वार ,रह स्वागत को तैयार

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8 वर्ष पहले
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