आ-श्रुति करो गीत-रहित यह संगीत
अनगणी ही वीणा के तन्तु-तंत्री को
गुजर गये कितने दिन क्षणभर में मेरे
तुमको लुभाने को गुञ्जन करते चयन
विषम पद तुल्य नूतन नवनीती।
मौलसिरी की मुकुलें तड़क अनागत उठीं
विचल-मैलंद-शृंखला लगीं अभी गानें
कामसखा-विधु अटवी में लगती हिय बही
सरस मृदुल तनु मद्धिम मधु रस-शीती।
नवपल्लवन का कैसे संगीत लगा चरमराने
ये सारंग के अंतस् का कैसा प्रीति-परागकणी
क्या आलाप लगे गाने वल्लरी-वीरूथ-प्रतानी
जीवंत हो गया सपन अर्दिति।
तब अविलम्ब चला मैं लेकर विद्याहीन
वही पुरानी बीन शीर्ण-संयोग अगुण
निज-प्रदिग्ध को लेकर अपनाने तुम्हें
ध्वनि-रवों से भरे सुंदर गीत पुनीती।
-सतीश शेखर श्रीवास्तव “परिमल”
सिंगरौली (मध्यप्रदेश)
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