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ग़ज़ल

Anonymous User

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            अभी जो मेरा घर जलाकर गया है
        
                                                    
                            
मेरा दोस्त ही था दग़ा कर गया है

ख़ुदा ठीक रक्खे उसे मेरे जैसे
जो मुझको ठिकाने लगा कर गया है

मज़म्मत के बदले उन्हें दो दोआएं
अजी ज़ह्र उनका शिफ़ा कर गया है

उठाया है तूफ़ां मुहब्बत का दिल में
नज़र से नज़र जो मिला कर गया है

लगाया गले और गिले सब मिटाया
अदू ए मुहब्बत नया कर गया है

फ़िदा एक मुस्कान पर कर दिया जां
मेरा दिल यहीं पर ख़ता कर गया है

फ़रेबी बहुत है ज़रा बचके रहना
वो जो ख़ूब हंस मुस्कुरा कर गया है

मेरे इश्क़ में कुछ कमी रह गई क्या
वो हमदर्दियां क्यों जता कर गया है

उसे ही मिलीं "शम्स "रुसवाईयां जो
गुनाहों से दामन बचा कर गया है

शम्स कुन्डवी, चन्दौली, उत्तर प्रदेश
3 वर्ष पहले
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