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पेपर वेट

Shruti Gautam

Mere Alfaz
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                            "पेपरवेट"
        
                                                    
                            

किसी सरकारी दफ़्तर में,
दूसरे माले की पीली सीली दीवारो के बीच
हज़ार दरारे उभर आई उसमे
बिखरे कागज़ो सी जो उलझी थी ज़िंदगी,
लटकती-भटकती अधूरी फाइलो के दरमियां
कवर खुलते ही उड़ने लगती थी मुसलसल
दुनियादारी के तल्ख बेकाबू झोंके,
टूटे शीशो से बारहा दखल देते थे मगर
जंग लगी चिटकनी खिड़की की खुल न सकी
चिकनी रेशम सी हाथो से छूटने लगती ये
पुराने पंखे की रह रह चीखती आवाजे
और गिरने लगती घबराकर इधर उधर
झुंझला रही थी कबसे,
समेटते, संभालते, सहेजते हुए
जाने कब से नाकामयाब मैं

तुमने आकर इसे मेज पर तरतीब कर दिया
शायद कोई 'पेपरवेट' हो तुम !

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8 वर्ष पहले
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