कल्पनाओं तथा संभावनाओं के मध्य,
मैं पलता हूं
मैं ख़्वाब हूं,
जो तुम्हें खूबसूरत लगता हूं
विवेचनाओं तथा पूर्वाग्रहों से दूर ,
स्वयं के अस्तित्व के लिए
भेद - भान से दूर ,
स्वयं की सजीवता को बनाए हुए,
रहता पलता ,
हा उसी कोठारी में ,
जिसकी खिड़कियां खुली है पर,
तख्त पर चढ़ी,
एक कठोर कुण्डी है,
उतारने की उसे तुम ,
जब जद्दोजहद में,
लगी रहती हो
तब मै ,
और निखरता हूं ,
शायद इसलिए तुम्हे,
अब मैं
तुमसे भी खूबसूरत लगता हूं।।
- श्रुति "अलंकार"