क्यूं छोड़ा था साथ मेरा, सारा जीवन महकाकर
क्या मिलता है तुमको, राख़ में शोले दहकाकर
बीते क्षण मत याद दिलाओ, मैं घायल हो उठता हूं
यूं न शब्दों के व्यंग्य चलाओ, मैं पागल हो उठता हूं
तुम सुरलोक की देवी हो, मैं धरती का वासी ठहरा
अब न पतन की राह दिखाओ,पावन मन बहकाकर
क्यूं छोड़ा......
क्या मिलता.....
तेरे मेरे जीवन में,अब अपनी अपनी पतवारें हैं
हम दोनों के बीच उठीं,अब मर्यादा की दीवारें हैं
मैं आया था इस जीवन की, सारी श्वासें लेकर
तुमने ही रीता लौटाया था,अगणित नियम बताकर
क्यूं छोड़ा......
क्या मिलता......
कुछ बंधन तेरे क़दमों में,कुछ मेरी मजबूरी होगी
जितनी दूर गए थे,सारे जीवन बस उतनी दूरी होगी
इस जीवन के छोर तलक,अलग अलग सीमाएं होंगी
जीवन दीप के बुझते ही,मिलना सारे भेद मिटाकर
क्यूं छोड़ा.....
क्या मिलता.....
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