देखो रुसवाई उसे कहाँ ले जाएगी
बात की फिर उसने ईमानदारी की
सच बोलना भी बहुत दुशवार है यारों
कैसे मुनादी करा दूँ राजदारी की
चिलमन से निहारते रहे तमाम रात
इस तरह लाज रक्खी पर्दादारी की
ना आ सकी काम तो हम क्या करें
हम ने तो की जब भी वफादारी की
जिस का है गारते चमन में हाथ
की उसी से उम्मीद पासबनी की
जब भी उठेंगी वो तूफान मचा देगी
लहरें अभी खामोश है ठहरे हुए पानी की
डॉ तारिक़ अली
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