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ग़ज़ल

Tariq Ali

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            देखो रुसवाई उसे कहाँ ले जाएगी
        
                                                    
                            
बात की फिर उसने ईमानदारी की

सच बोलना भी बहुत दुशवार है यारों
कैसे मुनादी करा दूँ राजदारी की

चिलमन से निहारते रहे तमाम रात
इस तरह लाज रक्खी पर्दादारी की

ना आ सकी काम तो हम क्या करें
हम ने तो की जब भी वफादारी की

जिस का है गारते चमन में हाथ
की उसी से उम्मीद पासबनी की

जब भी उठेंगी वो तूफान मचा देगी
लहरें अभी खामोश है ठहरे हुए पानी की

डॉ तारिक़ अली

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7 वर्ष पहले
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