खुला आसमान और आँख में पानी।
खाक होती जिन्दगी और ये जवानी।
उलझन की तरह पहाड़ सा खड़ा है।
गिरने से नही डरता झरने का पानी।
तन्हा किया मुझको पर मानता नही।
साथ जिन्दा है जिसकी यादें पुरानी।
जो बह गई उस हवा को कहाँ ढूँढू।
मिलने आई 'उपदेश' की मेहरबानी।
उपदेश कुमार शाक्यावार 'उपदेश'
गाजियाबाद
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।