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पहले चेत जाते, तो नहीं लगती HC की फटकार

अमित यादव /अमर उजाला, लखनऊ Updated Sun, 13 Apr 2014 09:13 AM IST
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विभागाध्यक्षों की लापरवाही से किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी (केजीएमयू) को शर्मसार होना पड़ रहा है।
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यदि विभागाध्यक्ष और दो अन्य शिक्षक बच्ची अंजलि के लिए दवाएं उपलब्ध कराने के लिए प्रशासन से सिफारिश कर देते तो उसका इलाज शुरू हो सकता था।

क्योंकि केजीएमयू में पहले से ये व्यवस्था है कि विभागध्यक्ष की सिफारिश पर जरूरतमंद मरीज को निशुल्क इलाज उपलब्ध कराया जा सकता है।

हाईकोर्ट की फटकार के बाद आखिरकार साढ़े तीन साल की बच्ची के लिए 14 हजार रुपये की कीमत के इंजेक्शन खरीद कर आ गए। ये दूसरा मौका है जब किसी गरीब मरीज को इलाज के लिए कोर्ट की मदद लेनी पड़ी।

इससे पहले कार्डियो थोरेसिक वस्कुलर सर्जरी (सीटीवीएस) विभाग में भर्ती एक बच्चे का भी इलाज नहीं हो पा रहा था। महंगा ऑपरेशन होने से केजीएमयू ने इलाज करने से हाथ खड़े कर दिए थे।
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इसके बाद परिवारवालों ने कोर्ट की शरण ली तो वहां से आदेश के बाद मरीज को इलाज उपलब्ध कराया गया। इसी तरह फैजाबाद के मसौधा ब्लॉक के निवासी दीपक यादव की बेटी अंजलि के मामले में भी केजीएमयू को कोर्ट की फटकार सुननी पड़ी है।

गुलियन बेरी सिंड्रोम (जीबीएस) बीमारी से पीड़ित इस बच्ची के पिता दीपक यादव ने विभागध्यक्ष से लेकर चिकित्सा अधीक्षक तक से प्रार्थना पत्र देकर इलाज की गुहार लगाई थी।

जब दोनों जगह से कोई सुनवाई नहीं हुई तो दीपक को कोर्ट की मदद लेनी पड़ी। कोर्ट से फटकार के बाद अंजलि के इलाज की व्यवस्था करनी पड़ी।

केजीएमयू के बाल रोग विभाग में भर्ती अंजलि के इलाज के लिए अब महंगे इंजेक्शन खरीद लिए गए हैं। जबकि छह दिन से उसके पिता को केजीएमयू के प्रशासनिक अधिकारियों और बाबुओं के दरवाजे खटखटाने पड़ रहे थे।
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