कोई भी अस्पताल, क्लीनिक या डॉक्टर मरीज को इलाज संबंधी रिकॉर्ड की कॉपी
देने से आनाकानी नहीं कर सकता।
सूबे के सभी सरकारी, निजी अस्पताल, क्लीनिक व
डॉक्टरों को मरीज के मांगने पर 72 घंटे के अंदर इलाज संबंधी मेडिकल
रिकॉर्ड की कॉपी उसे मुहैया करानी होगी।
रिकॉर्ड नहीं देना दंडनीय होगा और
ऐसे अस्पतालों या चिकित्सक के रजिस्ट्रेशन को रद्द किए जाने का मामला
बनेगा।
हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ के न्यायमूर्ति
देवी प्रसाद सिंह व न्यायमूर्ति अशोक पाल सिंह की खंडपीठ ने यह अहम विधि
व्यवस्था व आदेश एक निजी अस्पताल के मरीज को इलाज संबंधी ब्यौरा उपलब्ध
नहीं कराने के मामले में दिया।
कोर्ट ने मामले में राज्य सरकार को भी
निर्देश दिया कि मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया (एमसीआई) के 11 मार्च 2002 की
अधिसूचना के तहत अस्पतालों, नर्सिंग होम व डॉक्टरों के चिकित्सा व्यवसाय के
लिए रेगुलेशंस बनाए जाएं।
जांच के बाद जारी हो पंजीकरण प्रमाण पत्रअदालत
ने कहा कि सरकारी व निजी अस्पतालों, नर्सिंग होम या क्लीनिकों को पंजीकरण
प्रमाण पत्र जारी करते वक्त राज्य सरकार यह सुनिश्चित करे कि एमसीआई की
अधिसूचना का पालन हुआ है।
साथ ही यह भी निर्देश दिया कि रेगुलेशन बनाते समय
एक पर्यवेक्षण अफसर तैनात किए जाने की व्यवस्था की जाए, जो यह देखेगा कि
क्या नियमों में दी गई शर्तों का अस्पतालों व नर्सिंग होम ने पालन किया है
या नहीं।
अदालत ने एसजीपीजीआई समेत अन्य स्नातकोत्तर चिकित्सा संस्थानों को
भी शर्तों का पालन करने के साथ ही डिस्चार्ज होने के 72 घंटे के अंदर मरीज
का इलाज का पूरा मेडिकल रिकॉर्ड उसे या उसके नामित व्यक्ति को मुहैया
कराने के निर्देश दिए।
छह हफ्ते में सरकार दाखिल करे हलफनामाकोर्ट
ने याचिका को विचारार्थ मंजूर कर सरकार समेत अन्य पक्षकारों को छह हफ्ते
में जवाबी हलफनामा दाखिल करने को कहा है। इसके बाद याची दो हफ्ते में
प्रतिउत्तर दाखिल कर सकेगा।
अदालत ने कहा है कि जवाबी हलफनामा दाखिले करते
वक्त राज्य सरकार यह भी रिकॉर्ड पर पेश करेगी कि किस तरीके से इन निर्देशों
का पालन किया गया।
कोर्ट ने मामले को दो माह के तुरंत बाद सुनवाई के लिए
सूचीबद्ध करने को कहा है। कोर्ट ने अपेक्षा जताई कि सरकार की तरफ से अदालत
में दिए गए वचन व इस आदेश के प्रकाश में दो माह में संबंधित रेगुलेशन या
नियम बनाकर अधिसूचित कर दिया जाएगा।
वेबसाइट पर रखें रिकॉर्ड हाईकोर्ट
ने सरकार को कहा कि रेगुलेशन बनाते समय व पंजीकरण प्रमाणपत्र जारी करते
वक्त व्यवस्था की जाए जिससे सभी अस्पताल हर मरीज के दाखिले से डिस्चार्ज
तक का पूरा ब्यौरा वेबसाइट पर रखें। अदालत ने सख्त ताकीद की है कि ये
निर्देश तत्काल प्रभाव से सरकारी अस्पतालों, रजिस्टर्ड अस्पतालों व
क्लीनिकों में लागू किए जाएंगे।
यह है मामलायाची
समीर कुमार ने अपनी मां का गोमतीनगर के एक अस्पताल में 19 अप्रैल 2012 से
4 मई 2012 के बीच इलाज कराया, जिनकी इलाज के दौरान मृत्यु हो गई।
समीर ने
इलाज का पूरा खर्च अदा कर इलाज का ब्यौरा मांगा तो अस्पताल ने देने से
इन्कार कर दिया। इससे क्षुब्ध होकर याची ने हाईकोर्ट की शरण ली।
इस मामले
में अदालत ने सरकारी व निजी अस्पतालों समेत क्लीनिकों के बाबत जानकारी
सरकारी वकील से मांगी और लखनऊ के सीएमओ को संबंधित नियम-कानून के ब्यौरे के
साथ तलब किया था।