फिल्म इंडस्ट्री समाज सुधार की ठेकेदार नहीं। फिल्मों में वही दिखाया जाता है, जो समाज में हो रहा है। आखिर फिल्मों का मकसद भी तो अधिक से अधिक बिजनेस कर मुनाफा कमाना है।
फिल्मों पर जबरदस्ती रेग्युलेशन थोपना ठीक नहीं, बल्कि लोगों को सेल्फ रेग्युलेशन सीखना चाहिए। थोपे कायदों से कभी भी बेहतर नतीजे हासिल नहीं होते।
यह विचार वॉल्ट डिजनी इंडिया के एमडी व मशहूर फिल्म प्रोड्यूसर सिद्धार्थ राय कपूर ने व्यक्त किए।
वे शनिवार को इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट (आईआईएम) लखनऊ में आयोजित सालाना बिजनेस कॉन्क्लेव मैनफेस्ट-2014 में लीडर एक्सप्रेस ‘आइकंस’ प्रोग्राम में भावी प्रबंधकों से मुखातिब थे।
मैनफेस्ट में प्रिंट मीडिया पार्टनर अमर उजाला है। सिद्धार्थ राय कपूर ने पूरी बेबाकी से कहा कि आज भी फि ल्म से पहले सिगरेट व तंबाकू का सेवन न करने का ट्रेलर दिखाया जाता है।
आखिर इससे कोई सिगरेट पीना छोड़ तो नहीं देता। हां, जरूरत सेल्फ रेग्युलेशन की है, न कि जबरदस्ती थोपने की। उन्होंने कहा कि फिल्में प्रदर्शित बाद में होती हैं और विवादों में पहले घिर जाती हैं।
कुछ वाह्य कारणों से ही लोग अब संस्कृति के प्रति अधिक संवेदनशीलता दिखाते हैं, जबकि फिल्मों का मकसद किसी की भावनाओं को ठेस पहुंचाना नहीं है।
उन्होंने कहा कि सन् 1977 में रिलीज हुई अमर अकबर एंथोनी फिल्म में परदा है परदा गाने पर कोई बवाल नहीं हुआ लेकिन वह आज रिलीज होती तो शायद कुछ लोग उसे विवादों में घसीट लेते।
ऐसे में एक प्रोड्यूसर के सामने बड़ी दुविधा होती है। उन्होंने कहा कि धूम थ्री फिल्म ने मार्केटिंग और फिल्म प्रमोशन का तरीका बदला है।
इसमें फिल्म बनाने वालों ने लोगों की उत्सुकता बढ़ाई न कि बार-बार विज्ञापन दिखाकर फिल्म के अधिकांश अंश दिखाए। यह भी एक पब्लिसिटी स्टंट था।
इसमें फिल्म की बहुत सी चीजें छिपाई गईं, जिससे कोई पहले प्लॉट समझ ही नहीं पाया। उन्होंने कहा कि यह दौर फिल्म इंडस्ट्री के लिए गोल्डन टाइम है।
धूम थ्री जैसी 500 करोड़ की लागत से बनने वाली फिल्में हिट होती हैं तो दूसरी ओर शाहिद व काईपोचे जैसी बहुत कम बजट वाली फिल्में भी अच्छा बिजनेस करती हैं।
सिद्धार्थ राय कपूर ने कहा कि आगे आने वाले पांच वर्षों में महिलाओं पर अधिक फिल्में बनेंगी। हां, अब यह जरूर है कि ‘मदर इंडिया’ और ‘पाकीजा’ की तरह महिलाओं की परम्परागत छवि नहीं दिखाई जाती, बल्कि बोल्ड रूप भी पेश किया जाता है।
उन्होंने कहा कि वे शोले फिल्म 35 बार देख चुके हैं। थ्री-डी वर्जन भी देखा लेकिन टू-डी ही ज्यादा पसंद आया।
आईआईएम के स्टूडेंट के सवाल कि हमें आखिर ऑस्कर क्यों नहीं मिलता।
इस पर उन्होंने हंसते हुए कहा कि वहां बैठी ज्यूरी के लोग शायद हमारी ढाई घंटे की फिल्मों को ढंग से समझ नहीं पाते।