भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी के खिलाफ इंडिया अगेंस्ट करप्शन के खुलासे उतने प्रभावी भले न लगते हों, जितने रॉबर्ट वाड्रा के खिलाफ थे, लेकिन इससे शीर्ष राजनीति में व्याप्त भ्रष्टाचार और संवेदनहीनता का एक और उदाहरण तो सामने आता ही है। जो विदर्भ किसानों की आत्महत्याओं के लिए जाना जाता है, जो विदर्भ आज अनियोजित विकास, पारंपरिक खेती के विनाश और किसानों की त्रासदी की प्रयोगशाला बन चुका है, वहां पावर प्लांट्स और चीनी मिलों को पानी देने के लिए एक बांध बनता है, जिसके लिए किसानों की जमीन ली जाती है। बची हुई जमीन किसानों की गुजारिश के बावजूद उन्हें न लौटाकर गडकरी को दे दी जाती है, जो वहां गन्ने की सैंपलिंग करते हैं।
छोटे किसानों को उजाड़कर ताकतवरों के हितों की रक्षा में सरकार मददगार की भूमिका निभाती है। केजरीवाल के खुलासे का नितिन गडकरी ने तो जवाब दिया ही, समूची भाजपा अपने अध्यक्ष के बचाव में उतर आई है, लेकिन इसका उत्तर कोई नहीं देते कि अधिग्रहण के बाद बची जमीन नितिन गडकरी ने खुद क्यों ली। गडकरी ने इसका भी जवाब नहीं दिया कि जमीन पाने के लिए उन्होंने अजित पवार को चिट्ठी लिखी थी या नहीं। वह ठेकेदारों का बकाया दिलाने के लिए केंद्रीय मंत्री को चिट्ठी लिखते हैं, पर विदर्भ के किसानों की बेहतरी के लिए कभी उन्होंने किसी को कोई चिट्ठी लिखी हो, यह याद नहीं आता।
जो पार्टी चाल, चरित्र, चेहरा और चिंतन को अपनी विशेषता बताती है, जिस पार्टी के एक पूर्व अध्यक्ष ने हवाला में नाम आने पर संसद की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया था, अनियमितताओं के खुलासे पर जिस पार्टी के प्रधानमंत्री ने पेट्रोल पंप आवंटन का अपना फैसला पलट दिया था, उस पार्टी के अध्यक्ष का यह आचरण भाजपा में आए विचलन का नमूना तो है ही, उसकी मातृ संस्था पर भी कटु टिप्पणी है।
दरअसल एक जैसी राजनीति करने वाली पार्टियों के बचाव के तर्क भी एक जैसे हैं। रॉबर्ट वाड्रा के संदेहास्पद सौदे रद्द करने वाले के खिलाफ जिस तरह कार्रवाई हुई, कानून मंत्री की अनियमितता उजागर करने पर जिस तरह अरविंद केजरीवाल को सरेआम धमकी दी गई, ठीक उसी तरह नितिन गडकरी मामले की लीपापोती की सुनियोजित कोशिश हो रही है, जो खतरनाक ही होगी।