अलीगढ़। 132 साल पुराने इतिहास वाली नुमाइश इस बार गोलमाल और भ्रष्टाचार के आरोपों में घिरी रही। मगर कुछ काम सराहनीय भी रहे। बृहस्पतिवार को नुमाइश का समापन है। ऐसे में सवाल उठने लगा है कि नुमाइश में होने वाले अपव्यय और गोलमाल पर अंकुश के लिए क्यों न कोई पहरेदार खड़ा हो। जो जनता के बीच का हो। जिससे जनता के पैसे से लगने वाली इस नुमाइश का आम लोग पूरी तरह लुत्फ उठा सके, साथ ही अधिकारियों की कारगुजारियों पर भी अंकुश लग सके। नुमाइश के खर्चों की फिजूलखर्ची पर प्रतिबंध लगाने के लिए स्वतंत्र एजेंसी भी रहे, ऐसा होने पर ही फिजूलखर्ची पर रोक लग सकेगी।
इस बार ये बना इतिहास
इस बार की नुमाइश में निवर्तमान जिलाधिकारी आलोक कुमार के प्रयास से नीरज-शहरयार पार्क, पुस्तक मेला, विज्ञान प्रदर्शनी, पर्यावरण संरक्षण, आडीटोरियम की आधारशिला, मालवीय पुस्तकालय को दस लाख की मदद, शहर के टैलेंट को सम्मान, कृषि गोष्ठी में किसानों को लाभकारी जानकारी जैसे महत्वपूर्ण काम हुए। मगर सवाल इस बात का है कि क्या इस तरह के प्रयास आगे भी जारी रहेंगे और जो आडीटोरियम बनना तय हुआ है, वह कब तक बनकर तैयार होगा।
आरटीआई एक्टिविस्ट उठाएंगे गोलमाल को
इस बार की नुमाइश को लेकर आरटीआई एक्टिविस्ट विमल खेमानी का कहना है कि जनता के पैसे से होने वाली इस नुमाइश के आय-व्यय को आरटीआई के तहत सार्वजनिक न करना इस बात की गवाही देता है कि कुछ गोलमाल है। इस नुमाइश में जनता के प्रतिनिधियों का प्रमुख पदों पर होना बेहद जरूरी है। इसी तरह आम आदमी पार्टी के संजय वर्मा कहते हैं कि इस बार के गोलमाल को पार्टी प्रमुख अरविंद केजरीवाल के सामने रखा जाएगा।