...जब फिराक ने पूछा बद्र से, क्या शायरी करते हो
साहित्यकार एवं इलाहाबाद विश्वविद्यालय के उर्दू विभाग में शिक्षक रहे प्रो. अली अहमद फातमी बताते हैं कि 1974-75 की बात है, जब डॉ. बशीर बद्र शेरवानी फैक्ट्री में मुशायरे में शामिल होने आए थे। वह फिराक गोरखपुरी से मिलना चाहते थे। उस वक्त प्रो. फतमी विश्वविद्यालय में शोधार्थी थे। डॉ. बशीर के कहने पर वह उन्हें फिराक गोरखपुरी के पास ले गए। बताया कि कोई मिलने आया है। फिराक साहब ने डॉ. बशीर बद्र से बहुत ही अदब से पूछा कि क्या शायरी करते हो? डॉ. बशीर उस वक्त मुशायरे में काफी नाम कमा चुके थे।
डॉ. बद्र कहते थे, मैं तो सप्लाई इन डिमांड का शायर हूं
साहित्यकार प्रो. अली अहमद फातमी बताते हैं कि 70 व 80 के दशक में डॉ. बशीर बद्र काफी बड़ा नाम हुआ करता था। डॉ. बद्र जब भी उनसे मिले तो यही कहते कि वह तो सप्लाई इन डिमांड के शायर हैं। श्रोताओं को जो पसंद है, वही सुनाते हैं। प्रो. फातमी का मानना है कि डॉ. बशीर के जाने से ‘पॉपुलर मुशायरे’ को हुई क्षति की भरपाई अब मुश्किल है।
भोपाल में हुई थी प्रो. फातमी की आखिरी मुलाकात
प्रो. अली अहमद फातमी ने बताया कि आठ साल पहले वह मध्य प्रदेश सरकार से अवार्ड लेने भोपाल गए थे, तब डाॅ. बशीर बद्र से उनकी मुलाकात हुई थी। डॉ. बशीर काफी बीमार थे और बहुत कुछ भूल चुके थे। काफी याद दिलाने पर थोड़ा बोले और फिर उन्हें काफी देर तक निहारते रहे।
डॉ. बशीर की रचनात्मकता में झलकता था उनका संघर्ष: रविनंदन सिंह
साहित्यकार रविनंदन सिंह बताते हैं कि डॉ. बशीर बद्र का जीवन अनेक संघर्षों से गुजरा। 1987 के मेरठ दंगों की आग में उनका घर और निजी पुस्तकालय जल गया। इस घटना ने उनके मन को गहरे स्तर पर प्रभावित किया। इस पीड़ा की छाया उनकी अनेक गजलों और शेरों में दिखाई देती है। व्यक्तिगत दुख को उन्होंने अपनी रचनात्मक शक्ति बना लिया। उसी दौर में उन्होंने यह मशहूर शेर लिखा था, ‘लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में, तुम तरस नहीं खाते बस्तियां जलाने में।’ मुशायरे की दुनिया में 1974 से 1990 के बीच का दौर उनके रचनात्मक जीवन का अहम समय माना जाता है। इसी दौरान उनकी शायरी ने देश और विदेश में पहचान बनाई। उनकी जगह कोई नहीं ले सकता।