बागपत। मुजफ्फरनगर दंगे के बाद सियासत का जाट और मुस्लिम समीकरण भले ही बिगड़ गया हो, लेकिन खेती में यह समीकरण खूब चल रहा है। बागपत में प्याज का उत्पादन इसी समीकरण के दम कर सफलता हासिल कर रहा है। ज्यादातर खेत जाट समाज के किसानों के हैं जबकि खेती कर रहे हैं मुस्लिम के लोग। कहीं मुस्लिम और जाट साझीदार हैं तो कहीं मुस्लिमों ने जाट समाज के काश्तकारों से जमीन ठेके पर ले रखी है।
मवी कलां के सिमरो ने कृष्णपाल चौधरी के खेत में साझा कर रखा है तो सिराजू, सुरती चौधरी का साझीदार है। सुरेश पाल चौधरी और नूरू की खेती भी इसी दोस्ती पर आगे बढ़ रही है। मवी कलां के ही बाबू ने काठा में पापे चौधरी की जमीन ले रखी है प्याज की खेती के लिए। सुनील की साझेदारी जिले भगत चौधरी से है। काठा, मवी कलां, हसनपुर मंसूरी, डूंडाहैड़ा और खेकड़ा गांव में भी इसी समीकरण में प्याज की खेती हो रही है। दरअसल, इस क्षेत्र में प्याज उगाना सबसे पहले मुस्लिमों ने शुरू किया था।
इसके बाद चौधरियों (जाट समाज के किसानों) को भी प्याज की खेती रास आई। मुस्लिमों ने प्याज उत्पादन में महारथ हासिल की। इसका फायदा चौधरी ही नहीं, सभी बिरादरी के लोग उठा रहे हैं। अरविंद शर्मा और सलाउद्दीन भी साझीदार हैं और दलित बिरादरी के राकेश और सलीम भी। काठा के सिराजुद्दीन और इस्लामुद्दीन 100 -100 बीघा प्याज बोेते हैं। आसपास के गांव के लोग मवी कलां से मुस्लिम काश्तकारों को प्याज की बुआई के लिए ले जाते हैं।
इस्लामुद्दीन के घेर में बैठे सुरेश पाल चौधरी कहते हैं यहां जाट और मुस्लिम में भाई-भाई जैसा नाता है। जब मुजफ्फरनगर में दंगा हुआ, आंच बागपत तक आई, तब भी काठा, मवी कलां क्षेत्रमें कोई झगड़ा तक नहीं हुआ।
बढ़ता जा रहा है प्याज से प्यार
प्याज उत्पादन में मवी कलां ने सबसे पहले नाम कमाया। इसके बाद यह सिलसिला बढ़ता जा रहा है। जिला उद्यान अधिकारी राममेहर सोलंकी ने कहा जनपद में लहचोड़ा, घटोली, बोडा समेत 20 से ज्यादा गांवों में प्याज की खेती की जा रही है। ज्यादातर किसान गन्ने के साथ प्याज की बुआई कर रहे हैं। यमुना के खादर और हिंडन किनारे के गांवों में प्याज की खेती का क्रेज बढ़ रहा है।