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फख्र तो होता है पर दर्द भी देता है वो मंजर

Ballia Updated Sun, 18 Aug 2013 05:35 AM IST
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लालगंज। 92 बसंत पार कर चुके हैं। इसके बाद भी साथियों की उस वीरगाथा की बात करने पर आज भी उनकी आंखों में चमक आ जाती है। दोकटी थाना क्षेत्र के गोपालपुर निवासी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी धरीक्षण यादव ने उस नजारे को अपनी आंखों से देखा था जब देश के सपूतों ने अंग्रेजों को छकाते हुए बैरिया थाने पर तिरंगा फहरा दिया था। घटना को लगभग 71 साल हो गए हैं, इसके बावजूद इसकी यादेें आज भी उनके जेहन में कुछ इस तरह ताजा है, जैसे मानों कल की ही घटना हो। बैरिया शहीद दिवस की वर्षगांठ पर उन्होंने कहा कि सपूतों की शहादत की बात करने पर आज भी उनका सीना फख्र से चौड़ा हो जाता है। हालांकि साथियों को खोने का गम उनकी आंखों में आंसू भी दे जाता है।
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श्री यादव 1942 के आंदोलन की कहानी जुबानी सुनाते हैं। वे कहते हैं कि महात्मा गांधी द्वारा दिया गया ‘करो या मरो’ का नारा पूरे देशवासियों के दिलो-दिमाग पर छा गया था। बच्चा-बच्चा फिरंगियों के विरोध के बावजूद हाथों में तिरंगा लेकर स्वतंत्रता की अलख जगाने में जुटा हुआ था। बैरिया आंदोलन इसी जुनून की देन था। स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों ने बीज गोदाम, जहाजघाट और स्टेशन परिसर में जबरदस्त विरोध जताया था। इसी दौरान बैरिया थाने पर तिरंगा फहराने का संकल्प लिया गया। 18 अगस्त से कुछ दिन पहले ही सेनानी तिरंगा लेकर बैरिया थाने पहुंचै। वहां बुलाने पर भी थानेदार काजिम हुसैन थाने से बाहर नहीं आया। इस पर सेनानी थाने के गेट पर ही झंडा गाड़कर चले आए। बाद में थानेदार द्वारा झंडा उखाड़ने की बात पता चलने पर सेनानी भड़क उठे। पहले से तय योजना के तहत 18 अगस्त को दोपहर में लोग भारी संख्या में तिरंगा लेकर बैरिया थाने पहुंच गए। आंदोलनकारियों का इरादा भांप थानेदार सिपाहियों के साथ छत पर चढ़ गया और थाने के अंदर प्रवेश करने पर गोली मारने की धमकी दी। हालांकि स्वतंत्रता सेनानी कहां मानने वाले थे। इसी बीच सारी घेराबंदी को तोड़ते हुए नारायणगढ़ निवासी कौशल कुमार थाने की छत पर चढ़ गए और वहां तिरंगा फहरा दिया। इससे आक्रोशित थानेदार ने सिपाहियों को फायरिंग के निर्देश दे दिए। फिरंगी सिपाहियों ने कौशल का सीना गोलियों से छलनी कर दिया। साथी को शहीद होते देख अन्य सेनानियों ने सिपाहियोें पर पथराव शुरू कर दिया। इस पर गोलियां बरसाकर अन्य 19 सेनानियों को भी मौत के घाट उतार दिया गया। धरीक्षण कहते हैं कि संघर्ष के दौरान ही वह थानेदार हुसैन का घोड़ा लेकर फरार हो गए थे।
उनके मुताबिक शहीदों के इस जज्बे का ही नतीजा है कि देश आजाद हो सका। ऐसे में हर हिंदुस्तानी का फर्ज है कि वह शहीदों को नमन करे।
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