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भृगुनगरी को आर्सेनिक से कब मिलेगी मुक्ति

Ballia Updated Tue, 11 Sep 2012 12:00 PM IST
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रामगढ़। जिले का आर्सेनिक से अति प्रभावित क्षेत्र द्वाबा के 310 बस्तियों के भूमिगत जल में आर्सेनिक (मीठा जहर) नासूर बनता जा रहा है। सरकार ने जिलेवासियों को इससे निजात दिलाने के अब तक करोड़ों रुपये खर्च किए लेकिन हुआ कुछ नहीं। जिले में दर्जनों ओवर हेड टैंक, सौ से अधिक आर्सेनिक रिमूवल प्लांट, सैकड़ों हैंडपंपों की डीप बोरिंग हुई। बावजूद क्षेत्र के लोगों को आर्सेनिक मुक्त जल नसीब नहीं हो सका। लोग बाध्य होकर दूषित जल पीने को विवश हैं। वर्तमान में बेलहरी ब्लाक के तिवारी के टोला की 300 आबादी में 150 से अधिक लोग आर्सेनिक जल से लोगों के शरीर पर चकत्ते निकल आए हैं साथ ही इन्हें सांस फूलने की बीमारी भी हो गई है।
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दशकों से द्वाबा सहित जिले के दर्जनों गांव आर्सेनिक की जद में हैं। शासन-प्रशासन ने आर्सेनिक प्रभावित क्षेत्र के बाशिंदों को शुद्ध जल उपलब्ध कराने की मुहिम छेड़ रखी है। बावजूद इसके आज तक लोगों को आर्सेनिक से निजात नहीं मिल सकी। बेलहरी ब्लाक के राजपुर एकौना, चौबेछपरा, तिवारी टोला सबसे अधिक आर्सेनिक की चपेट में है। इससे लोग सांस, चर्म रोग संबंधित दर्जनों बीमारियों के मरीज हो चुके है। केवल तिवारी टोला में अब दो दर्जन से अधिक लोगों की मौत आर्सेनिक से हो चुकी है। बावजूद लोगों को दूषित जल से मुक्ति नहीं मिल सकी है। बता दे कि वर्ष 2002-03 में यादवपुर यूनिवर्सिटी कलकत्ता ने यह खुलासा किया कि द्वाबा के दर्जनों गांव की भूमिगत जल में आर्सेनिक की मात्रा मानक से कई गुना अधिक है। उस समय प्रशासन ने मामले को दबाने की कोशिश की थी। लेकिन आईआरटीसी लखनऊ ने पेयजल के नमूने की जांच कराई तो जो सच्चाई सामने आई उससे सबके होश उड़ गए। इसके बाद प्रशासन की निद्रा टूटी। वर्ष 2004 में स्वास्थ्य विभाग के महानिदेशक डा. एम मूर्तजा ने इन गांवों के जल एवं लोगों के स्वास्थ्य की सच्चाई देखी। इसके बाद यहां के लोगों को सदर अस्पताल में भर्ती कराने का निर्देश दिया। बावजूद कोई पीड़ितों की सुधी लेने नहीं आया। विभिन्न संस्थाओें ने यहां आकर जल का नमूना लिया और अपना रिपोर्ट सरकार को सौैंपा। बीएचयू के सर सुंदर लाल अस्पताल और एम्स के डाक्टरों ने भी इन गांवों में आर्सेनिक की पुष्टी की है।80 फीट से 250 फीट तक के भू-जल में जांच के दौरान आर्सेनिक की मात्रा पाई गई है। पानी में आर्सेनिक होने की वजह से अभी तक इससे निजात दिला पाना संभव नहीं हो सका है। हालांकि उस क्षेत्र के लोगों को आर्सेनिक मुक्ति के लिए आर्सेनिक रिमूवल प्लांट लगाए गए हैं। भू-जल में आर्सेनिक मिलने का खुलासा वर्ष 2002-03 में यादवपुर यूनिवर्सिटी कलकता ने भी किया था। भू-जल में आर्सेनिक पाए जाने की सहायक अभियंता जल निगम ने भी पुष्टि की है।
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