रामगढ़। स्वच्छ पेयजल के लिए वर्षों से आजमाए तरीके ही कारगर हैं। आज भी कुएं ही शुद्ध पेयजल मुहैया करा सकते हैं। वैज्ञानिकों का दावा है कि कुएं में सूर्य की रोशनी सीधे जल में पड़ती है और आक्सीजन प्रचुर मात्रा में मिलती है। इसलिए उनका पानी भूजल में आर्सेनिक की बढ़ी मात्रा से निजात दिलाने में मददगार हो सकता है।
गौरतलब है कि भारत सरकार के आंकड़ों के मुताबिक जिले की 310 बस्तियां आर्सेनिक की जद में है। यहां के लोगों को शुद्ध पानी मिले इस पर अरबों रुपये खर्च हो चुके है। बावजूद समस्या जस की तस है। द्वाबा क्षेत्र में दर्जनाें पानी टंकियां बनी, सैकड़ाें की तादाद में आर्सेनिक रिमुअल प्लंाट भी लगे, लेकिन लोगों को मीठे जहर से निजात नहीं मिली। सबसे दयनीय स्थित बेलहरी ब्लाक के गंगापुर व राजपुर एकौना की गांव है। एक दशक के अंदर यहां दर्जनों लोगाें की मौत हो चुकी है, सैकड़ों लोग आर्सेनिकजनित बीमारियों की जद में है। यादवपुर विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक डा. दीपांकर चक्रवर्ती व डा. आरएन दत्ता की माने तो कुएं का जल ही आर्सेनिक से निजात दिला सकता है।
क्योंकि सूर्य की रोशनी कुएं के जल में पड़ती है और आक्सीजन प्रचुर मात्रा में मिलती है। इस प्रकरण में दुखद यह है कि जिले के अधिकतर कुएं रख-रखाव के अभाव में बंद हो गए हैं या अंतिम सांसे ले रहे हैं। लोगाें को शुद्ध जल पाने के लिए एकबार फिर से पुराने तरीकों पर भरोसा करते हुए मुहिम चलाकर कुओं को फिर से खुदवाना पड़ सकता है।