बांदा। ग्रामीण परिवेश में पल-बढ़ रहे बालक-बालिकाओं को हाईटेक माध्यमिक शिक्षा उपलब्ध कराने की शासन की मंशा खरी नहीं उतर सकी। तीन साल पूर्व स्वीकृत हुए राजकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालयों के अभी तक भवन तक नहीं तैयार हो सके। पेड़ की छांव में बैठकर बच्चे शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं। मानक के अनुसार टीचरों की तैनाती न होने से हाईस्कूल बोर्ड परीक्षाओं में सर्वोच्च अंक लाने का सपना लिए ग्रामीण बालक-बालिकाओं की उम्मीदों पर पानी फिर रहा है।
राष्ट्रीय माध्यमिक शिक्षा अभियान के तहत ग्रामीण इलाकों में बालक-बालिकाओं को मुफ्त व उच्च गुणवत्ता की शिक्षा देने के लिए वर्ष 2009-10 में जिले में तीन ब्लाकों में राजकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय स्वीकृत हुए। निर्माणदायी संस्था को 14 माह में भवन तैयार कर हस्तांतरित करना था। संस्था ने 58 लाख 52 हजार रुपए भी ले लिया है। भवन तो तैयार हैं, पर अभी तक इनमें दरवाजे व खिड़की नहीं लगे। टॉयलेट ब्लाक की कौन कहे एक अदद साधारण शौचालय तक संस्था नहीं बनवाया। तीन विद्यालयों में 150 से लेकर 200 बच्चे अध्ययनरत हैं। कमासिन ब्लाक के ममसीखुर्द राजकीय उच्ततर माध्यमिक विद्यालय में 100 से अधिक बच्चे हैं। इतने सारे बच्चों का भविष्य संवारने का जिम्मा सिर्फ प्रिंसिपल पर है।
बबेरू के पखरौली राजकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय में भी सवा सौ बच्चों पर दो शिक्षक हैं। नरैनी के जबरा खुर्द में कक्षा नौ में 91 तथा कक्षा 10 में 48 बालक-बालिकाएं हैं। यहां प्रिंसिपल के अलावा एक शिक्षक की तैनाती है। उसे भी दूर विद्यालय से संबंद्ध कर दिया गया है। प्रधानाचार्य पर 139 बच्चों के पठन-पाठन का जिम्मा है। साथ ही उन्हें मीटिंग आदि भी देखना पड़ता है। ऐसे में विद्यालय में अध्ययनरत बालक-बालिकाओं को खुद ही पढ़ाई करनी पड़ती है। शिक्षकों की कमी से बोर्ड परीक्षा की तैयारी बालक-बालिकाओं पर भारी पड़ रही है।