बांदा। शहर की सफाई व्यवस्था में कर्मियों व संसाधनों की कमी आड़े आ रही है। मानक के अनुरूप सफाईकर्मी न होने से ज्यादातर वार्डों में गंदगी के अंबार हैं। वाहनों के अभाव में कई-कई दिनों तक कूड़ा नहीं उठाया जाता। नालों की सफाई का काम दैनिक मजदूरों के जिम्मे है। जिस दिन मजदूर नहीं मिले, उस दिन नाला सफाई का काम ठप रहता है। कुल मिलाकर कहें तो कर्मचारियों और संसाधनों की कमी की वजह से बारिश के मौसम में शहरवासियों को गम सहने को मजबूर होना पड़ रहा है। गंदगी बढ़ने और जलभराव से संक्रामक बीमारियां फैलने की आशंका भी बढ़ गई है।
लगभग दो लाख आबादी वाले बांदा शहर के 28 वार्डों को साफ-सुथरा रखने के लिए नगर पालिका में महज 321 सफाईकर्मी हैं। इनमें 110 स्थायी और 211 संविदा कर्मी हैं। मानक के अनुसार इतने वार्डों के लिए 421 कर्मचारियों की तैनाती होनी चाहिए। यही हाल सफाई संसाधनों के भी हैं। पालिका में इस समय सिर्फ 14 वाहन हैं। इनमें दो लोडर, छह ट्रैक्टर, दो डंफर, एक जेसीबी व दो थ्री ह्वीलर शामिल हैं। ऐसे ही कूड़ा उठाने वाले हाथ ठेलों की भी भारी कमी है। पालिका में तीन सालों से हाथ ठेलों की खरीद ही नहीं हुई है। सीमित संसाधनों व कर्मियों के भरोसे किसी तरह शहर की सफाई व्यवस्था चल रही है।
सफाईकर्मी जो कूड़ा घरों से बटोरते हैं, वह कई-कई दिनों तक सड़क की पटरियों पर पड़ा रहता है। शहर में 20 बड़े व 40 छोटे नाले हैं, जिनमें अभी तक आधे नालों की भी सफाई नहीं हो सकी। बारिश होने पर जगह-जगह भीषण जल भराव की स्थिति पैदा हो जाती है।
नाले-नालियां चोक होने से बारिश का पानी लोगों के घरों में भर रहा है। गंदगी व जलभराव के चलते बहुत से लोग संक्रामक बीमारियों की गिरफ्त में आकर अस्पताल पहुंच रहे हैं। पालिका में ईओ का पद रिक्त होने की वजह से सारा दायित्व इस समय प्रशासक के जिम्मे है। पालिका के सफाई निरीक्षक जितेंद्र गांधी ने इस बाबत बताया कि पालिका में तीन सालों से कर्मियों की नियुक्ति नहीं की गई है। नाला साफ कराने के लिए दैनिक मजदूर खोजे नहीं मिल रहे हैं। लोगों ने नालों पर कब्जे कर रखे हैं। ऐसे में सफाई कराने में दिक्कतें आ रही हैं। सीमित कर्मियों व संसाधनों के सहारे बेहतर सफाई का प्रयास किया जा रहा है।