बस्ती। घोषित गन्ना मूल्य की पीड़ा कम हुई भी नहीं थी कि गेहूं को लेकर भी किसानों को मायूसी झेलनी पड़ी। किसान मानते हैं कि साल के अंतिम क्षणों में घोषित गेहूं के समर्थन मूल्य में केवल 65 रुपये की बढ़ोतरी करके छल किया गया है। अन्नदाताओं का तर्क है कि लागत और कीमत के बीच बेहद कम अंतर रह गया है। ऐसे में गन्ने के बाद किसानों के लिए गेहूं की खेती फायदे का सौदा नहीं रही।
बता दें कि चालू रबी सीजन के लिए बुधवार को केंद्र सरकार ने गेहूं का न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) 1350 रुपये प्रति क्विंटल घोषित की है। पिछले साल के मुकाबले यह केवल 65 रुपये अधिक है। जागरूक किसानों का कहना है कि एमएसपी के निर्धारण में कृषि मूल्य और लागत आयोग की सिफारिशों को दरकिनार किया गया है।
वामपंथी नेता कामरेड केके तिवारी के मुताबिक एक सोची समझी साजिश के तहत केंद्र सरकार ने गेहूं का दाम कम बढ़ाया। ताकि किसान गेहूं के प्रति उदासीन हो जाए और सरकार को खरीद करके स्टाक की समस्या से निजात मिल जाए। किसान नेता दीवान चंद्र पटेल का कहना है कि चूंकि गेहूं का भरपूर स्टाक मौजूद होने का ढोंग रचा गया है। इसलिए जानबूझकर किसानों को हतोत्साहित किया गया है। किसानों में प्रतापपुर के सोनू सिंह, मुंडेरवा के रत्नेश पाठक, परशुरामपुर के रिपुनंदन तिवारी का कहना है कि हर बार की तरह इस बार भी किसान की उम्मीदों पर कुठाराघात किया गया है।