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मेले में दिखी परंपरा और संस्कृति की झलक

Basti Updated Sat, 29 Dec 2012 05:30 AM IST
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विक्रमजोत। अमौलीपुर के हुनमान मंदिर परिसर में शुक्रवार को लगे मेले में बड़ी संख्या में लोगों ने पहले पूजा-अर्चना की और बाद में मेले का लुत्फ उठाया। परंपरा और संस्कृति को समेटे इस मेले में पहरुआ, चौका-बेलन की दुकानें लगी थीं तो सर्कस और जादूगरी के खेल दिखाकर लोगों का भरपूर मनोरंजन किया गया।
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अमोढ़ा के राजा जालिम सिंह की ओर से अमौलीपुर में बनवाए गए प्राचीन हनुमान मंदिर पर वर्षों से मेले का आयोजन होता आ रहा है। इसी कड़ी में शुक्रवार को भी मेला लगा। मेले में उमड़ी भीड़ ने इसका जमकर आनंद उठाया। दूर-दूर से पहुंचे मेला देखने वालों ने पहले मंदिर परिसर के सात कुओं के जल से खुद को अभिसंचित किया और बाद में बजरंग बली की आराधना की। इसके बाद मेला देखने निकल पड़े। फैजाबाद, आजमगढ़, गाजीपुर, बनारस आदि से आए दुकानदारों ने मिठाइयों की दुकानें सजाई थीं। जबकि सर्कस, बच्चों के झूले और जादूगरी के खेल मेले का आकर्षण बने रहे। मेले में लोगों ने परंपरागत जलेबी और उबले सिंघाड़ा का लुत्फ उठाया। कुछ लोग मंदिर में कड़ाही भी चढ़ा रहे थे। एक दिवसीय इस मेले में बस्ती फैजाबाद, अंबेडकर नगर और गोंडा आदि जिले के लोग शामिल हुए। मेले में छावनी थाने की पुलिस मुस्तैद दिखी।
मेले के आयोजन में प्रमुख भूमिका निभाने वाले प्रधान राम सिंह, रामकृष्ण धर द्विवेदी, रणजीत बहादुर सिंह, राजू सिंह, हरिओम सिंह, भानुप्रताप, जंजाली पाल, राम प्रसाद गुप्ता, जगदंबा दूबे, ईश्वरशरण लाल श्रीवास्तव आदि ने बताया कि वर्षों से मेले का आयोजन होता आ रहा है।
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लकड़ी के सामानों की खूब होती है बिक्री
यूं तो मेले में खाने के समान से लेकर जरूरत के कई समानों की बिक्री होती है। मगर जो मेले का प्रमुख आकर्षण होता है वह लकड़ी की बनी वस्तुएं होती हैं। मेले में चौका, बेलन, पीढ़ा, पहरुआ, सिंचाई मेें इस्तेमाल होने वाला हाथा, तख्त, दरवाजे, कुर्सी मेज आदि की खूब बिक्री हुई।

खुद आई थीं सरयूजी
पुराने लोगों का मानना है कि मंदिर के महंत रहे बाबा बालक रामदास के देहावसान पर मंदिर परिसर में सरयू नदी खुद बहकर आई थीं और उनकी अस्थियों की राख को अपने साथ बहाकर ले गई थीं। मंदिर के वर्तमान महंत देवदास जी इसकी पुष्टि करते हैं। कहते हैं कि पुराने लोगों ने खुद उन्हें यह जानकारी दी है।

नहीं दिखी भेड़ और तीतर की लड़ाई
अमौलीपुर के मेले में पहले भेड़ और तीतर की लड़ाई हुआ करती थी। जो समय के साथ खत्म होती गई। अब मेले में न तो कोई भेड़ लड़ती है और न ही तीतर।
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