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नातिया कलाम से शायरों ने बांधा समां

Basti Updated Wed, 15 Jan 2014 05:45 AM IST
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बस्ती। बारावफात की पूर्व संध्या पर रहमतगंज में स्थित जामा हनफिया के परिसर में नातिया मुशायरा का आयोजन हुआ। यह आयोजन अदबी बज्म की देखरेख में हुआ। इसमें दूरदराज से आए शायरों ने भाग लिया।
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शायरों ने मोहम्मद साहब के जन्म दिवस पर अपने-अपने नातिया कलाम से महफिल को रौनक किया। जिसकी सदारत मौलाना मकसूद अहमद ने की। जमुनी तहजीब के शायर सलीम बस्तवी अजीजी ने कार्यक्रम को बखूबी अंजाम दिया। मुशायरे का आगाज तिलावते कुरआन से हुआ। शायर बदरूल हसन सिद्वीकी ने ‘कौन है मॉ हलीमा के आगोश में जिससे नान पे दौरे शबाब आ गया’ आदिल बस्तवी ने ‘तकदीर हम्हें ले चल सरकार के कदमों में, गर आज नहीं तो कल सरकार के कदमों’ सुनाकर वाहवाही बटोरी। इसी कड़ी में असद बस्तवी के इस शेर ‘फिर भी मेरी जबान पे जारी रहा दुरूद फिक्रे मआश का रहा अंबार रात दिन’ को खूब सराहा गया। सलीम बस्तवी अजीजी के इस शेर ‘सुन ऐ बादे सबा चल मदीना चलें, इश्क से करके मामूर सीना चलें, राह में बस दूरूदों की बारिश हो और दीद-ए-तर का लेकर सफीना चलें’ पर लोगों की खूब दाद मिली। शायर अनवर हुसैन पारसा ने कुछ यूं कहा ‘इबलीस को खुदा से अदावत न थी, न है इबलीस को एनाद है खैरूल अनाम से’ शायर ताजीर बस्तवी का अंदाजे बयां भी खूब रहा ‘तमाम शहर में अम्नो अमा के फूल खिलें, नबी की जैसी अगर तरजे गुफ्तगू रखिए’ बुजुर्ग शायर एहसान अहमद के कलाम‘ दयारे तैबा से पूछती हैं ब सोजे दिल बेकरार आंखें, जो तुमने देखी हो उनकी सूरत तो दे दो मुझको उधार आंखें पर लोगों ने खूब तालियां बजायी। शैदा बस्तवी ने ‘नूर में है जाते रेसायल मआब की, जिसका है जिक्र सब ही समावी किताब में’ आखिर में सदारत कर रहे मौलाना मकसूद बस्तवी के कलाम ‘ जमीं ता आसमॉ अनवार ही अनवार मुबारक हो, मुबारक हो छाए हैं, मेरे सरकार आएं हैं’ को खूब दाद मिली। मुशयरे को कामयाब बनाने में मौलाना रेयाज अहमद, समीर खान के हनफिया के छात्रों का योगदान रहा।
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