नजीबाबाद। आर्यिका रत्न 105 सौैहार्दमति माता जी ने कहा कि व्यक्ति स्वयं सम्मान पाना चाहता है जबकि दूसरों को सम्मान नहीं देना चाहता। दूसरों को सम्मान देने में अहंकार बाधक बनता है। जब विनम्रता की बात आती है तो अहंकार सामने आकर खड़ा हो जाता है। झुकना आसान नहीं बल्कि कठिन होता है।
श्री दिगंबर जैन पंचायती मंदिर में आचार्य श्री सिद्धांत सागर महाराज की परम शिष्या आर्यिका सौहार्दमति माता जी ने कहा कि पहले भक्त बनो। भक्त को भक्ति से ही मुक्ति मिलती है। भक्त बनने की पहली शर्त है कि जो करना है अब तुम्हें करना है। हमें अब कुछ नहीं करना है। दूसरी शर्त है कि अगर, मगर, लेकिन, किंतु, परंतु को जीवन से निकाल दो। यह ऐसे शब्द हैं जो प्रभु से दूर ले जाते हैं। तीसरी शर्त है समर्पण। जैसे मिट्टी कुम्हार को समर्पित होकर तपती है, मिटती है। फिर कलश बनकर सिर पर चढ़ती है। पांचों इंद्रियां, रसका, घ्राण, चचु और कर्ण मानव का सबसे बड़ा धन हैं। इस अवसर पर प्रेम चंद जैन, जिनेश्वर प्रसाद जैन, शीतल प्रसाद जैन, विनोद जैन, मनोज जैन, जितेंद्र जैन, शशि जैन, ऋषभ जैन, संध्या जैन, ममता जैन आदि श्रद्धालु उपस्थित रहे।