अफजलगढ़। शिक्षा का अधिकार अधिनियम के तहत बच्चों को शिक्षा के प्रति जागरूक करने के लिए शासन हर वर्ष करोड़ों रुपये पानी की तरह बहा रहा है। पर बुद्धि परीक्षण को होनी वाली वार्षिक व अर्द्धवार्षिक परीक्षा के लिए विभाग के पास फूटी कौड़ी तक नहीं है, जिससे हजारों बच्चों के भविष्य के साथ खिलवाड़ हो रहा है।
सरकार प्राथमिक व उच्च प्राथमिक स्कूल में पढ़ने वाले बच्चों पर हर वर्ष नि:शुल्क ड्रेस, मिड-डे मिल, छात्रवृत्ति आदि पर तो पानी की तरह पैसा बहाती है, लेकिन बुद्धि परीक्षण को स्कूलों में होने वाली परीक्षाओं के लिए विभाग के खजाने में फूटी कौड़ी तक नहीं है। इससे लगता है कि सरकार सिर्फ बच्चों के पोषण को ही स्कूलों में योजनाएं संचालित कर रही हैं, अच्छी नौकरी पाने का सपना सरकार के सरोकारों में शामिल नहीं है। वजह 17 दिसंबर से शुरू होने जा रही परीक्षाओं की बच्चों ने जीतोड़ मेहनत कर तैयारी तो कर ली है, पर विभाग बच्चों को परीक्षा कैसे दिलाएगा यह प्रश्न अभिभावकों को परेशान कर रहा है। जिले में करीब प्राथमिक स्कूल 1786 और उच्च प्राथमिक 762 हैं। इनमें पढ़ने वाले बालक, बालिकाओं की संख्या क्रमश: एक लाख 69 हजार 762 व 55 हजार छह सौ 42 है। सरकार इन बच्चों के साथ धोखे के सिवाय कुछ नहीं कर रही। अधिकांश स्कूलों के बच्चे घरों से कॉपी से पेपर लाएंगे और प्रश्नपत्र उनका ब्लैक बोर्ड होगा। ऐसा नहीं कि सभी स्कूलों में ऐसा होता है, कुछ अध्यापक अपने जेब खर्च से बच्चों को बाजार से परीक्षा में प्रयोग होने वाले प्रश्नपत्र व उत्तर पुस्तिकाओं को उपलब्ध भी कराते हैं। प्राथमिक शिक्षक संघ के प्रांतीय कोषाध्यक्ष ठाकुर संजय का कहना है कि परीक्षाओं में एक बच्चे पर करीब 25 रुपये का खर्च आता है। यह खुद एक सवाल है कि लाखों की संख्या में पढ़ने वाले बच्चों पर कितना खर्च होगा। उधर, जिला शिक्षण शिक्षा संस्थान की प्राचार्या सुषमा अग्रवाल का कहना है कि परीक्षा के लिए कोई बजट नहीं आता। इस बात की पुष्टि बीएसए ने भी की है।