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विवि तो बढ़े पर शिक्षा में नैतिकता घटी- विजय मिश्र

Chitrakoot Updated Sun, 15 Sep 2013 05:37 AM IST
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चित्रकूट। आज देश में आजादी के समय की तुलना में विश्वविद्यालयों और कालेजों की संख्या तो बढ़ी है पर यह चिंता का विषय है कि तब की तुलना में अब की शिक्षा में नैतिकता का ह्रास ज्यादा हुआ है। शिक्षा की गुणवत्ता भी घटी है, इस पर विचार करने की जरूरत है। ये बातें प्रदेश सरकार के वैकल्पिक ऊर्जा राज्यमंत्री विजय मिश्र ने कहीं। माध्यमिक शिक्षा राज्य मंत्री विजय पाल ने जगद्गुरु रामभद्राचार्य के विवि की सराहना करते हुए कहा कि किसी भी सरकार ने ऐसे अकल्पनीय काम को नहीं किया।
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विजय मिश्र शुक्रवार को जगद्गुरु रामभद्राचार्य विकलांग विवि के पांचवें दीक्षांत समारोह में मुख्य अतिथि थे। उन्होंने कहा कि आज न तो नैतिक शिक्षा दी जाती है, न संस्कार सिखाए जाते हैं और महापुरुषों की जीवनी के बारे में बताया समझाया जाता है। शिक्षा का मूल उद्देश्य भटककर धनोपार्जन हो गया है। ऐसी नींव जिससे पूरा जीवन संस्कारवान हो, उसकी शिक्षा नहीं दी जाती। ऐसे स्कूलों की जरूरत है, जिनमें आधुनिकता और प्राचीन जीवन मूल्यों का संतुलन हो, संस्कार की शिक्षा दी जाए, आत्मबल का भान कराया जाए और इस तरह का विद्यालय है जगद्गुरु रामभद्राचार्य विकलांगें विश्वविद्यालय। उन्होंने कहा कि पूरी दुनिया के उच्चतम कोटि के 200 विश्वविद्यालयों में भारत के एक भी विश्वविद्यालय का नाम न होना हमारे लिए चिंता की बात है। इनके साथ आए दूसरे राज्यमंत्री (माध्यमिक शिक्षा) विजय बहादुर पाल ने कहा कि सरकारें आती रहीं और जाती रहीं पर किसी ने इस अकल्पनीय काम को करने का उत्तरदायित्व नहीं निभाया पर जगद्गुरु रामभद्राचार्य ने इसे किया। रामभद्राचार्य को उन्होंने कर्मयोगी की संज्ञा दी। उन्होंने कटाक्ष किया कि लोगों को रुपये के उठने- गिरने की चिंता है पर नैतिकता के नीचे जाने की नहीं है। सोने में जंग लगेगी तो लोहे का क्या होगा? उन्होंने कहा कि लोग अपने बच्चों को इंजीनियर, डाक्टर बनाना चाहते हैं पर कोई समाजसेवी नहीं बनाना चाहता। इसके पूर्व दीक्षांत समारोह का शुभारंभ विश्वविद्यालय की छात्राओं द्वारा मां सरस्वती की वंदना से हुआ। कुलगीत गाया गया। कुलपति प्रो. बी पांडे ने विश्वविद्यालय की प्रगति आख्या पढ़ी। आजीवन कुलाधिपति रामभद्राचार्य ने दीक्षांत भाषण में विद्यार्थियों को मातृ, पितृ, आचार्य और अतिथि के साथ राष्ट्र देवो भव का भाव संजोने की दीक्षा दी। वह बोले कि कर्त्तव्य से प्रमाद मत करो, जीवन में कुछ देने का प्रयास करना चाहिए। समारोह में सभी संकायों में सबसे ज्यादा अंक पाने वाली छात्रा कल्पना साहू (परास्नातक संगीत) और शोध छात्रा ज्योति विश्वकर्मा को स्वर्ण पदक से सम्मानित किया गया। इस मौके पर 14 छात्रों को स्वर्ण पदक, दो को कुलाधिपति पदक और दो को पीएचडी की उपाधि प्रदान की गई। पूर्वांचल विश्वविद्यालय के कुलपति मियांजान विकलांग विश्वविद्यालय के कुलसचिव डा. लक्ष्मीकांत पांडे, डा. अवनीश मिश्र, डा. योगेश दुबे, प्रो. आर्या प्रसाद, हेमराज चौबे, संस्थान के पीआरओ उमाशंकर मिश्र आदि की उपस्थिति रहे। उद्बोधन के दौरान विकलांगों को समझाने के लिए सांकेतिक भाषा विशेषज्ञ एसपी मिश्रा भी वहां मौजूद रहे।

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शिक्षा में बाधक तत्व है तुष्टीकरण- रामभद्राचार्य
कुलाधिपति ने कहा, अखिलेश को काम नहीं करने देते उसके अंकल्स
उद्बोधन के दौरान मुख्यमंत्री और अन्य पर कटाक्ष किया, सुनते रहे दोनों मंत्री
विकास श्रीवास्तव
चित्रकूट। मुख्यमंत्री अखिलेश सिंह यादव का दौरा निरस्त होना निश्चित रूप से जगद्गुरु रामभद्राचार्य को साल गया। उद्बोधन के दौरान उन्होंने इस आक्रोश को छिपाने की कोशिश भी नहीं की। वह बोले कि मुख्यमंत्री के आगमन में जिन लोगों ने बाधा पैदा की है, उनको विकलांगों की आह लगेगी। अखिलेश को इसका प्रायश्चित्त करना होगा। शिक्षा की गुणवत्ता तब तक नहीं सुधरेगी जब तक कि सरकारें तुष्टीकरण बंद नहीं करतीं। उन्होंने तुष्टीकरण को शिक्षा में बाधक तत्व बताया। उन्होंने यह भी कहा कि युवा अखिलेश को उसके अंकल्स काम नहीं करने देते। काश, इन अंकलों को अकल आ जाए। अपने उद्बोधन के दौरान जगद्गुरु रामभद्राचार्य मुख्यमंत्री के न आने के संभावित कारणों पर खुलकर बोलते रहे और दोनों मंत्री किंकर्त्तव्य विमूढ़ स्थिति में सुनते रहे।
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मुख्यमंत्री अखिलेश सिंह यादव और विधानसभा अध्यक्ष माता प्रसाद पांडे को विकलांग विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह में आना था। विश्वविद्यालय का पूरा परिवार मुख्यमंत्री के आने की तैयारियों में जुटा था। लगभग एक सप्ताह से विकलांगों के चेहरे की खुशी देखते बनती थी पर जब बुधवार को सीएम के आने से लगभग बारह घंटे पहले उनके न आने की सूचना यहां पहुंची तो सभी के चेहरों पर मायूसी छा गई। दीक्षांत समारोह में हर चेहरे पर यह मायूसी झलकी भी। स्पष्टवक्ता जगद्गुरु रामभद्राचार्य ने उद्बोधन में कहा कि ऐसा लगता है कि विकलांगों का अब कोई नहीं है। मैं अकेले कब तक। मेरा पहले का नाम गिरधर मिश्र है, मैं विकलांगों के लिए पर्वत उठा भी लूंगा पर लकुटिया तो सरकार को लगानी पड़ेगी। मुख्यमंत्री के न आने से बहुत कष्ट है, अवसाद है, रोष है। अरे, वह यहां 15 मिनट का समय तो दे सकते थे। जिसने भी उनको यहां आने से रोका है, उसको विकलांगों की आह लगेगी। उनका कोपभाजन, दंडभाजन बनना पड़ेगा। अखिलेश योग्य हैं पर उनको काम नहीं करने दिया जा रहा। मैंने तो समय नहीं मांगा था, खुद उन्होंने ही आने की बात कही थी। फिर क्या घट गया, किसने घटाया। उन्होंने नाम लिए बगैर कहा, अखिलेश को अंकल्स परेशान करते हैं, वृद्धों को हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए, युवा को काम करने देना चाहिए पर ऐसा नहीं हो रहा है। उन्होंने पार्टियों की तुष्टिकरण की नीति पर भी जमकर हमला बोला और कहा कि मैं रोजाना ऐसी बातों से जूझता हूं। किसी सवर्ण का बेटा अगर सौ फीसदी विकलांग है और किसी दलित का बेटा 30 फीसदी विकलांग तो नियमानुसार दलित के बेटे को प्रवेश देना पड़ता है। उन्होंने मुख्यमंत्री के प्रतिनिधि के रूप में आए मंत्रियों से मांग की कि ऐसा कानून बनाया जाए जिसमें विकलांगों का जाति के आधार पर नहीं बल्कि विकलांगता के आधार पर वर्गीकरण किया जाए। वोट बैंक की राजनीति सबके लिए खतरनाक है। इसके अलावा उन्होंने कहा कि अखिलेश को गुरु दक्षिणा देनी होगी, विश्वविद्यालय का अक्तूबर से बिजली और पानी का बिल माफ करना होगा। मैं विकलांगों को फ्री भोजन देता हूं, सरकार बिजली और पानी दे। दावा भी किया, सरकार मेरे हिसाब से विश्वविद्यालय को सुविधाएं दे तो मैं दो साल में विश्व के विश्वविद्यालयों में विकलांग विश्वविद्यालय को पहले नंबर पर कर दूं।

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दूध का जला छाछ फूंककर...
संतोष सिंह
चित्रकूट। मंच पर जगद्गुरु रामभद्राचार्य ने इस कहावत को सार्थक कर दिया कि दूध का जला छाछ को फूंककर पीता है। मंच पर अपने उद्बोधन के दौरान मंत्री विजय मिश्र ने घोषणा की कि वह अपने पास से विश्वविद्यालय के लिए दो लाख एक रुपये देने की घोषणा करते हैं पर जगद्गुरु ने पांचों उंगलियों का इशारा किया। इस पर विजय मिश्र ने सुधार किया अच्छा जगद्गुरु के आदेशानुसार पांच लाख। यह देख रामभद्राचार्य के बायीं ओर बैठे मंत्री विजय पाल ने भी उनके कान में कुछ कहा। इस पर रामभद्राचार्य ने गर्दन हिलाई और माइक की ओर इशारा कर दिया। अब विजय पाल फिर माइक पर जनता से मुखातिब थे-मैं भी अपने पास से विश्वविद्यालय के लिए पांच लाख रुपये देने की घोषणा करता हूं। बाद में रामभद्राचार्य ने कह भी दिया कि आशा है कि मंच से की गई घोषणा को मंत्री पूरा करेंगे। उन्होंने एक नाम लेकर यह भी कहा कि इसके पहले यह यहां आकर दस लाख देने की घोषणा कर गए थे पर दिया नहीं।

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यह जगद्गुरु का अपना विचार होगा- विजय
चित्रकूट। मुख्यमंत्री के प्रतिनिधि के रूप में आए दोनों मंत्रियों, संयोग से दोनों का नाम विजय था, ने इस बात से इंकार किया कि प्रदेश सरकार तुष्टीकरण कर रही है। उन्होंने कहा कि अगर ऐसा होता तो आरक्षण संबंधी बिल का विरोध क्यों किया जाता। उन्होंने कहा कि जगद्गुरु का यह खुद का विचार होगा पर यह गलत है। उन्होंने एक सवाल के जवाब में कहा कि प्रदेश के सभी जिलों में कानून व्यवस्था की स्थिति अच्छी है।

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जगद्गुरु को समझाने की कोशिश में लगे रहे मंत्री
चित्रकूट। मुख्यमंत्री के न आने का आक्रोश जगद्गुरु रामभद्राचार्य के चेहरे पर साफ था। अपने विश्राम कक्ष में उन्होंने सभी को यह कहकर बाहर किया कि वह मंत्रियों से कुछ बात करना चाहते हैं। जाहिर है, स्पष्टवादी रामभद्राचार्य ने क्या बातें की होंगी, क्या उलाहना दिया होगा। भाषण में भी उनकी यह तल्खी कई बार झलकी। दोनों मंत्रियों ने अपने उद्बोधन में जो संज्ञा जगद्गुरु को दी, वह भी इस बात को साबित कर रही थी कि आक्रोश को कम करने की हिदायत कहां से मिली है। विजय पाल ने उनको सर्वथा निराले विकलांग विश्वविद्यालय के कुलाधिपति बताया तो विजय मिश्र ने उनको प्रात: स्मरणीय और परमपूज्यनीय बताया। पर जगद्गुरु का कहना था कि अखिलेश के न आने का आधा क्लेश बाकी है। इस मौके पर विश्वनाथ सेवार्थ न्यास वाराणसी के डा. सुमन राव ने उनको पूर्वांचल रत्न के रूप में प्रशस्ति पत्र दिया।
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