रुद्रपुर। पूरा जून और जुलाई का एक सप्ताह बीताकर आया मानसून धरती की तपन को कम नहीं कर पा रहा है। झमाझम बारिश के लिए जाने जाने वाले बरसात के चार महीने साल दर साल सूखते जा रहे हैं। रुद्रपुर में वर्षा की घटती दर किसानों के लिए परेशानी का सबब बन रही है।
दस साल के रिकार्ड पर नजर डालें तो इस साल अब तक सबसे कम बारिश हुई है। कम वर्षा के कारण खरीफ के फसल की पैदावार पर प्रश्न खड़ा हो गया है। वर्ष 1998 की बाढ़ के बाद रुद्रपुर क्षेत्र में अनियमित बारिश का सिलसिला शुरू हुआ। क्षेत्र में जैसे जैसे हरे वृक्षों की तादाद घटती गई। वर्षा की दर भी घटती गई। तहसील कार्यालय के वर्षा माप विभाग से मिले आंकड़े के अनुसार वर्ष 1999 से 2008 तक बरसात के चार महीने जून, जुलाई, अगस्त और सितंबर में औसतन 800 से 1000 मिलीमीटर बारिश का रिकार्ड रहा है। वर्ष 2009 से यह आंकड़ा घटता जा रहा है। 2008 में बरसात के चार महीनों में 987 मिमी वर्षा हुई थी, जो 2009 में घटकर 545.56 मिमी पर पहुंच गई। वर्षा की दर में कमी के कारण 2009 में रुद्रपुर को सूखा ग्रस्त इलाका घोषित कर दिया गया। 2010 में वर्षा की दर और कम हो गई। इस साल चार महीनों में रुद्रपुर में 379 मिमी पानी बरसा जबकि 2011 में वर्षा की दर और गिर कर 340 मिमी पर पहुंच गई। 2012 में 13 जुलाई तक रुद्रपुर में बादल सिर्फ 60 मिमी पानी बरसा पाए हैं। कम वर्षा के कारण धान की फसल का रकबा 40 प्रतिशत कम हो गया है। देर से बारिश शुरू होने से अधिकांश किसान धान रोपने की बजाय खेत में मक्का और अरहर छींट कर रह गए हैं।
खतरे की घंटी है, मानसून का बदला मिजाज
रामजी सहाय पीजी कालेज के भूगोल विभाग के अध्यक्ष डा.चंद्रभान वर्मा ने कहा कि हर साल घट रही वर्षा की दर और मानसून का बदलता मिजाज पर्यावरण के लिए खतरे की घंटी है। मानसून और वर्षा के समय चक्र में अनियमित परिवर्तन पूर्वांचल की बढ़ती आबादी और अंधाधुंध वृक्षों की कटाई के कारण हो रहा है। पांच साल में रुद्रपुर क्षेत्र में वृक्षों से आच्छादित 30 प्रतिशत भूभाग खाली हो गया। मानसून के समय से नहीं आने की बड़ी वजह हरियाली की कमी है।