बरहज। मोती बीए का नाम जेहन में आते ही एक असाधारण प्रतिभा वाले व्यक्ति का चेहरा आंखों के सामने आ जाता है। वे कवि, कलाकार के अलावा स्वाधीनता आंदोलन के सजग सिपाही भी थे।
इनकी साहित्यिक यात्रा जीवन मूल्यों, संघर्षों और उदार विचारों की सफल गाथा रही है। मेघदूत जैसी कृति का भोजपुरी अनुवाद, शेक्सपियर के सानेट और अब्राह्म लिंकन की जीवनी का भोजपुरी में रूपांतरण करने वाले मोती बीए 18 जनवरी 2009 को हमसे दूर चले गए। लेकिन वे हमारे बीच अपनी अमर कृतियों के साथ आज भी जिंदा हैं। मोती बीए एक अगस्त 1919 में तहसील क्षेत्र के बरेजी गांव में पैदा हुए थे। इन्होंने 1941 में एमए, बीटी और साहित्य रत्न की डिग्री हासिल कर फिल्म जगत से जुड़ गये। इसके बाद साहित्य के क्षेत्र में दस्तक दी। साहित्यिक परंपरा में हिंदी, भोजपुरी, उर्दू के साथ अनुवाद की भी रचनात्मकता हैं। इनकी रचना संसार पर गौर किया जाए तो मुख्य रूप से भोजपुरी में सेमर के फूल, मोती के मुक्तक, बन बन बोले ले कोयलिया काव्य संग्रह, हिंदी में अश्वमेघ यज्ञ, कवि और कविता, पायल छम, छम बाजे, आंसू डूबे गीत, हर सिंगार के फूल, इतिहास का दर्द, तुलसी रसायन के साथ ही उर्दू में रश्के गुहर, तिनका-तिनका शबनम शबनम, लव एंड ब्यूटी जैसी रचनाएं प्रसिद्ध हैं। इसके साथ ही शेक्सपियर के सानेट का हिंदी पद्मय अनुवाद, अब्राह्म लिंकन का भोजपुरी रूपांतरण, मेघदूत का भोजपुरी पद्यानुवाद सहित करीब पचास से अधिक विविध रचनाएं हैं। कई पत्र पत्रिकाओं में आलेख, जीवंत संस्मरण और डायरी के पन्ने भी प्रकाशित हैं। उनका मानना था कि दर्द जितना इलाज उतना हो, मुश्किलें जितनी रियाज उतना हो, तंगदस्ती में हम जीयें जितना बंदा परवर नवाज उतना हो। सचमुच महाकवि और साहित्यिक सम्राट मोती जी को समझ पाने के लिए विशाल कविता संसार के सागर में गहरा गोता लगना पड़ेगा। मोती बीए हिंदी फिल्मों में भोजपुरी गीतों के प्रवर्तक के रूप जाने जाते हैं। नदिया के पार सहित सैकड़ों फिल्मों में गीतों की रचना की है। आज उनके पांचवें स्मृति पर्व पर श्रद्धासुमन अर्पित करते हैं।