आजादी के बाद से सात दशकों में मतदान प्रणाली भी काफी हाईटेक हो गई है। 70 वर्षों में वोट डालने की प्रक्रिया में दो बड़े बदलाव हुए हैं। वर्ष 1951-1962 के बीच हुए चुनाव में मतदाता सिर्फ सादी पर्ची से मतदान करते थे।
1962 में पहली बार बैलेट पेपर के माध्यम से प्रत्याशी के चुनाव चिन्ह पर ठप्पा लगाकर मतदान किया गया। वहीं, 2002 में ईवीएम आने पर मतदान और मतगणना की राह आसान हो गई।
आज के दौर में ईवीएम से लेकर लाइव मतदान तक की व्यवस्था हो चुकी है। आजादी के तुरंत बाद न तो बैलेट पेपर होता था और न ही ईवीएम। सिर्फ पर्चियां ही निर्णायक होती थीं। लकड़ी के डिब्बे के बैलेट बॉक्स होते थे,
जिनके खुलने पर नेताजी के सियासी भाग्य का फैसला होता था। चुनावी प्रक्रिया के हर दौर को देख चुके बुजुर्ग अब रोमांचित होते हैं। नई पीढ़ी को शायद ही पता हो कि एक दौर वो भी था, जब वोट के लिए सिर्फ पर्चियों का प्रयोग किया जाता था।
बुजुर्ग बताते हैं कि देश के आजाद होने के बाद सन 1951-52 में चुनाव हुआ था, तब प्रत्याशियों की पहचान के लिए अलग-अलग रंग के डिब्बे रखे जाते थे। ये रंग ही नेताजी की पहचान होते थे। मतदाताओं को वोट डालने के लिए कागज की पर्चियां दी जाती थीं।
जिस नेता के पक्ष में वोट डालना होता था, उस प्रत्याशी के रंग के डिब्बे में पर्ची डाली जाती थी। इसके बाद 1957 में दूसरी बार चुनाव हुए तो सरकार ने चुनावी प्रक्रिया में काफी सुधार किया।
लकड़ी के डिब्बों पर नेता का चुनाव चिन्ह और नाम आ गए। दल के चुनाव चिन्ह व प्रत्याशी के नाम वाले डिब्बे में पर्ची डालनी होती थी। यह व्यवस्था तीसरे विधानसभा चुनाव तक रही।
1962 के चुनाव में पहली बार बैलेट पेपर का प्रयोग चलन में आया। बैलेट पेपर में प्रत्याशी का नाम व चुनाव चिन्ह भी अंकित किया गया। इसके बाद ही मतदाताओं को पसंदीदा प्रत्याशी के आगे ठप्पा लगाने का मौका मिला। बैलेट पेपर आने पर अलग-अलग रंग के डिब्बों की व्यवस्था खत्म हो गई।
2002 में विधानसभा चुनाव में पहली बार कुछ स्थानों पर ईवीएम का प्रयोग हुआ। 2004 में लोकसभा चुनाव में भी इसी का इस्तेमाल हुआ। इससे चुनाव में होने वाला खर्चा तो कम हुआ ही, साथ ही गिनती में भी बहुत आसानी हो गई।
मत पत्रों की छंटाई की सिरदर्दी खत्म हुई, साथ ही ईवीएम की कंट्रोल यूनिट में हर वोट का हिसाब दर्ज होने लगा। मशीन ये भी बता सकती है कि वोट कब पड़ा।